गुरु रमाकांत आचरेकर ने भारतीय क्रिकेट को कई नामचीन सितारे दिए हैं। इसमें सबसे चमकदार सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली का माना जाता है। सचिन ने तो अपनी प्रतिभा और क्षमता का पूर्ण उपयोग अपने करियर के दौरान किया और अपनी उपलब्धियों की बदौलत 'क्रिकेट के भगवान' कहे जाते हैं। आलोचकों और क्रिकेट विशेषज्ञों के मुताबिक विनोद कांबली की प्रतिभा तेंदुलकर से ज्यादा थी, लेकिन वे अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर सके और असाधारण तरीके से शुरू हुए उनके करियर का अंत निराशाजनक रहा।
विनोद कांबली का जन्म 18 जनवरी 1972 को मुंबई में हुआ था। उनका करियर सचिन के समानांतर ही था। बचपन से ही भारत के लिए खेलने का सपना देखने वाले विनोद कांबली पहली बार तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने सचिन तेंदुलकर के साथ स्कूल क्रिकेट में इतिहास रच दिया। शारदाश्रम विद्यामंदिर के लिए दोनों ने 664 रन की नाबाद साझेदारी की थी, जो आज भी एक रिकॉर्ड है।
कांबली की टाइमिंग और बल्लेबाजी के बेखौफ अंदाज ने उन्हें जल्द ही घरेलू क्रिकेट में बड़ी पहचान दी थी। घरेलू क्रिकेट की सफलता के बाद कांबली ने 1993 में इंग्लैंड के खिलाफ भारत के लिए टेस्ट डेब्यू किया। अपने दूसरे ही टेस्ट में मुंबई में उन्होंने 224 रन की शानदार पारी खेली। दिल्ली में जिम्बाब्वे के खिलाफ 227 रन बनाए। इन दो पारियों के दम पर वह सबसे तेज 1,000 टेस्ट रन बनाने वाले बल्लेबाज बने। इस प्रदर्शन के बाद कांबली को भारत का अगला महानतम बल्लेबाज माना जाने लगा था, लेकिन वे अपनी शुरुआती सफलता को बरकरार नहीं रख सके और उसे बनाए रखने के लिए शायद जरूरी समर्पण नहीं दिखा सके।