Sunil Gavaskar vs Raj Singh Dungarpur: अक्सर ये चर्चा होती है कि आईपीएल के आने से भारतीय क्रिकेट में क्या-क्या बड़े बदलाव आए? लिस्ट में इस एक बदलाव की कोई चर्चा नहीं करता कि अब कोई भी, भारत में, बीसीसीआई या और उसके अधिकारियों से झगड़ा नहीं करता क्योंकि झगडे का मतलब है आईपीएल से जो भी कनेक्शन है वह बंद। आईपीएल ने तो उन्हें भी चुप करा दिया जो क्रिकेट के मामलों पर बेबाक अपनी राय देते थे और बीसीसीआई या उसके अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाने में कोई कमी नहीं रखते थे।

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लगभग 25 साल पहले, भारतीय क्रिकेट ने कुछ ऐसा ही एक अजीब किस्सा देखा था। एक पूर्व भारतीय कप्तान ने अपने नजरिए की वकालत में खुलेआम एक बड़े बीसीसीआई अधिकारी को चुनौती दी। मुद्दा छोटा था लेकिन इनके आपस में उलझने से एक कभी खत्म न होने वाली लड़ाई में बदल गया।

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बेंगलुरु में NCA (नेशनल क्रिकेट एकेडमी) के बनने और इसके काम करना शुरू करने में सुनील गावस्कर ने पर्दे के पीछे, बड़ा योगदान दिया था। उनकी खूब सलाह ली थी बोर्ड ने। तब ऐसी मुथैया थे बीसीसीआई चीफ और राज सिंह डूंगरपुर थे इसके एक पावरफुल अधिकारी। बीसीसीआई ने NCA को चलाने के लिए एक 5 सदस्य की कमेटी बना दी राज सिंह डूंगरपुर की अध्यक्षता में। एकेडमी के उद्घाटन के वक्त भी राज सिंह ने सनी के योगदान का जिक्र किया था। उन्होंने ही बताया कि गावस्कर की बदौलत ही ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट एकेडमी के रॉडनी मार्श (ऑस्ट्रेलिया के भूतपूर्व टेस्ट विकेटकीपर जो बाद में कोच बने) से संपर्क हो पाया और उसी से NCA को उसी पैटर्न पर बना पाए। मई 2000 में NCA में पहले गेस्ट लेक्चरर भी सुनील गावस्कर थे।

2000-01 में जिम्बाब्वे टीम 2 टेस्ट और 5 वनडे खेलने भारत आई। राज सिंह के कहने पर बीसीसीआई ने NCA के ट्रेनीज़ को एक चुनौती वाला अनुभव देने के लिए, शेड्यूल में एक नेशनल क्रिकेट एकेडमी XI बनाम जिम्बाब्वे XI 3 दिन का मैच रख दिया। इस 8-10 नवंबर 2000 को इंदौर में खेले मैच के साथ ही ये टूर शुरू हुआ था। गड़बड़ ये हुई कि सुनील गावस्कर को NCA XI का टूर पर आई टीम के विरुद्ध मैच खेलना पसंद नहीं आया। उन्होंने अपने खूब पढ़े जाने वाले सिंडिकेट कॉलम में बीसीसीआई के ऐसे मैच के शेड्यूल की आलोचना कर दी।
गावस्कर की दलील ये थी कि इस मैच से NCA के ट्रेनी को तो कोई फायदा मिलना नहीं जबकि इसकी जगह ऐसा मैच खेलते जिसमें बाकी घरेलू खिलाड़ियों को मौका मिलता तो शायद वे बेहतर खेल से भारत के लिए खेलने के और दावेदार बन जाते। वे ऐसे मैच के मौके के ज्यादा हकदार थे। गावस्कर ने लिखा भी कि ये सिर्फ़ उनकी अपनी सोच है और वह NCA की आलोचना नहीं कर रहे पर वे इस बात से उठे बवाल को न रोक पाए। नुकसान तो हो चुका था।

इससे NCA कमेटी के चेयरमैन राज सिंह डूंगरपुर और सुनील गावस्कर के बीच एक खुली जंग शुरू हो गई। दोनों की बयानबाजी से माहौल बिगड़ता गया और नौबत ये आ गई कि राज सिंह ने खुले आम कह दिया कि गावस्कर NCA कमेटी से इस्तीफ़ा दे दें। राज सिंह ने कहा, 'गावस्कर एक साथ दो नाव पर सवार नहीं हो सकते (जिस NCA की आलोचना करें, उस से जूड़े भी रहें)। गावस्कर ने कमेटी की अगली मीटिंग के दौरान इस्तीफा दे दिया।

मामला तब भी ठंडा नहीं पड़ा क्योंकि राज सिंह उनके इस्तीफा देने के तरीके पर खूब बोले (आरोप था: 'उन्होंने अपना इस्तीफ़ा लेटर टेबल पर फेंक दिया')। इसी पर राज सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे हालत में, गावस्कर काम नहीं कर सकते। गावस्कर ने भी साफ़ लिखा, 'मैं भविष्य में खुद को NCA में नहीं देख सकता। मैंने अपने देश के लिए गर्व और गरिमा के साथ खेला है और ऐसे किस्से के बाद उन्हीं परिस्थितियों में काम नहीं कर सकता।'

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इस इस्तीफे से तो अब राज सिंह और सुनील गावस्कर के बीच, एक ही कमेटी से जुड़े होने वाला पर्दा भी हट गया और बहस का दायरा इतना बड़ा हो गया कि एक-दूसरे से अलग-अलग मुद्दों पर उलझने लगे। एक-दूसरे के काम के तरीके और व्यवहार (साथ में बुद्धि की बात भी) पर ताने मार रहे थे। अगर गावस्कर ने डूंगरपुर का ये राज खोला कि उन्होंने एक बार खुद माना थे कि वे 'नाकामयाब' रहे तो राज सिंह ने जवाब में कहा कि जो खुद शीशे के घर में रहते हों, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते। कुल मिलाकर माहौल बड़ा खराब हो गया था।

इसी बीच, NCA के डायरेक्टर हनुमंत सिंह और कोच वासु परांजपे ने भी NCA से इस्तीफा दे दिया। आम सोच ये थी कि दोनों ने गावस्कर के सपोर्ट में इस्तीफा दिया है। राज सिंह इस बारे में समझाते रहे कि इन इस्तीफों का सुनील गावस्कर के इस्तीफे से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन NCA में एक-दूसरे पर विश्वास खत्म होता जा रहा था।

राज सिंह बोले 'हमने हनुमंत सिंह को कुछ और समय तक डायरेक्टर बने रहने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।' उनका ज्यादा जोर इस बात पर था कि गावस्कर के इस्तीफा देने से NCA पर कोई असर नहीं पड़ा है, 'उनके जाने के बाद तो एक 'माली' (ग्राउंड्समैन) ने भी इस्तीफ़ा नहीं दिया है।' हनुमंत सिंह ने लंबे समय तक अपने परिवार को अकेला न छोड़ पाने की दिक्कत बताई तो परांजपे ने अपने बेटे जतिन के शादी के बाद, अलग नए घर में शिफ्ट होने से अपनी पत्नी को मुंबई में अकेला न छोड़ने की दिक्कत का जिक्र किया। बहरहाल इस सब से NCA के हालात चिंताजनक बनते जा रहे थे।

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कुछ महीनों बाद एकदम बीसीसीआई ही बदल गया। जगमोहन डालमिया नए बीसीसीआई चीफ बन गए और ये पोस्ट संभालते ही उनके सबसे पहले फैसलों में से एक था राज सिंह डूंगरपुर की जगह सुनील गावस्कर को NCA  कमेटी का नया चीफ बनाना। सब पहले से जानते थे कि राज सिंह और डालमिया के रिश्ते कैसे हैं, इसलिए ऐसा कुछ तो होना ही था।

इस बीच सनी अपनी नई असाइनमेंट से और व्यस्त हो गए थे। अचानक ही फिर से NCA का काम मिला तो वे इसके लिए तैयार नहीं थे। वे डालमिया को इनकार तो नहीं कर पाए लेकिन इस बार NCA के साथ काम करते हुए उतने प्रोडक्टिव नहीं रहे। कमेंटेटर की ड्यूटी में काफी समय निकल जाता था। वे कई-कई दिन NCA में जा भी नहीं पाते थे। उनकी गैर-मौजूदगी का असर NCA पर आने लगा। अक्टूबर 2002 में ये मुद्दा अखबारों में उछल गया और यहां तक दावा किया गया कि नेशनल क्रिकेट एकेडमी, एक महीने से ज़्यादा से, बिना चेयरमैन के काम कर रही है। गावस्कर को इशारा मिल गया था। बीसीसीआई की अगली एजीएम में गावस्कर ने कह दिया कि उनके लिए NCA चेयरमैन के तौर पर काम करना बड़ा मुश्किल हो रहा है। इसलिए बीसीसीआई किसी और को चुन ले लेकिन बीसीसीआई ने रिप्लेसमेंट के मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं दिया।

गावस्कर को कुछ और समय काम के लिए मना लिया और उन्हें ये भी साफ कर दिया कि उनका NCA से जुड़े रहना, भले ही दूर से ही क्यों न हो, बहुत जरूरी है। ये आधा-अधूरा इंतज़ाम अक्टूबर 2006 तक चलता रहा और आखिर में NCA चेयरमैन को बदल दिया गया। नए चेयरमैन कपिल देव थे। जैसे ही कपिल देव को इस अपॉइंटमेंट के बारे में मीडिया से पता चला तो वे बोले कि उन्हें तो NCA के नए चेयरमैन के तौर पर अपने रोल के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

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चरनपाल सिंह सोबती

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Charanpal Singh Sobti
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