United Arab Emirates: जापानी मार्शल आर्ट 'जूडो' की शुरुआत जिगोरो कानो ने की थी। जिगोरो ने पारंपरिक लड़ाई के तरीकों से प्रेरित होकर इस खेल का ईजाद किया था। आत्मरक्षा, अनुशासन और मानसिक मजबूती विकसित करने वाले इस खेल में ताकत से अधिक तकनीक, संतुलन और प्रतिद्वंद्वी की ऊर्जा का उपयोग सिखाया जाता है।
शुरुआत में इस खेल को आत्मरक्षा प्रणाली माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसे शैक्षिक मूल्य, शरीर और चरित्र के विकास के लिए पहचाना जाने लगा।
20वीं सदी की शुरुआत में, पश्चिमी देशों ने जापान की इस कला में दिलचस्पी दिखाई। कई देशों में इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया और यह खेल संगीत हॉल, सर्कस और मेलों में नजर आने लगा।
यूएसए और दुनिया के कई देशों में, जूडो सबसे पहले सेना और पुलिस कैंप में मशहूर हुआ, जिसके बाद इस मार्शल आर्ट को फिटनेस सेंटर्स में सिखाया जाने लगा। कुछ समय बाद सिर्फ पुरुषों ने ही नहीं, बल्कि महिलाओं ने भी इस कला का अभ्यास शुरू कर दिया।
1964 टोक्यो ओलंपिक गेम्स में जूडो ने 'खेलों के महाकुंभ' में अपना डेब्यू किया, लेकिन अगले ओलंपिक से इस खेल को बाहर कर दिया गया। हालांकि, 1972 म्यूनिख ओलंपिक में इस खेल ने एक बार फिर से वापसी की। इसके बाद से जूडो ओलंपिक का हिस्सा बना हुआ है। 1992 बार्सिलोना ओलंपिक में इस खेल को महिलाओं के लिए भी शुरू किया गया।
इसे खेलने वाले खिलाड़ी को 'जूडोका' कहा जाता है, जबकि कोच 'सेंसेई' कहलाता है। इस खेल में खिलाड़ी 'जुडोगी' पहनकर प्रतिस्पर्धा करते हैं। 'जुडोगी' शब्द 'जुडो' (जूडो) और 'गी' (वर्दी) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ 'जूडो की वर्दी' है।
जूडो के खेल में थ्रो, होल्ड और सबमिशन के लिए अंक दिए जाते हैं। इस खेल में जूडोका अपने प्रतिद्वंदी को बल के साथ जमीन पर पटकने या तय समय तक उस पर दबाव बनाए रखने की कोशिश करता है।
ओलंपिक में 7 भार वर्गों में खेले जाने वाले इस खेल में पुरुषों के क्वालीफाइंग राउंड में 4 मिनट, जबकि सेमीफाइनल और फाइनल राउंड में 5 मिनट का समय दिया जाता है। वहीं, महिलाओं के लिए सभी राउंड मैच में 4 मिनट का समय निर्धारित होता है। अगर कोई मुकाबला टाई रहता है तो इसके लिए अतिरिक्त समय दिया जाता है, जहां पहला अंक या पेनाल्टी हासिल करने वाला जूडोका जीत दर्ज करता है।
जूडो के खेल में थ्रो, होल्ड और सबमिशन के लिए अंक दिए जाते हैं। इस खेल में जूडोका अपने प्रतिद्वंदी को बल के साथ जमीन पर पटकने या तय समय तक उस पर दबाव बनाए रखने की कोशिश करता है।
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उम्मीद है कि प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान करते हुए विश्व स्तरीय कोचिंग, अंतरराष्ट्रीय मंच और विश्व रैंकिंग में सुधार के साथ भारत भविष्य में इस खेल में ओलंपिक पदक अपने नाम कर सकता है।