भारत की पूर्व डबल्स स्टार ज्वाला गुट्टा ने भारतीय बैडमिंटन सिस्टम की आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि इसमें एकाधिकार, पक्षपात और खिलाड़ियों के विकास के लिए दूरगामी सोच की कमी है। साथ ही, उन्होंने इस खेल में अपने योगदान को उचित सम्मान न मिलने पर भी सवाल उठाए हैं।

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'आईएएनएस' से ​​खास बातचीत में गुट्टा ने कहा कि भारतीय बैडमिंटन के भीतर की समस्याएं किसी एक व्यक्ति के फैसलों से कहीं ज्यादा गहरी हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की पूर्व गोल्ड मेडलिस्ट ने बताया कि उन्होंने कई बार अधिकारियों से संपर्क करके अपनी अकादमी के जरिए जमीनी स्तर पर योगदान देने के प्रस्ताव रखे, लेकिन उन्हें ज्यादातर नजरअंदाज ही किया गया।

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गुट्टा ने कहा, "पूरा सिस्टम ही एक समस्या है। इस पर पूरी तरह से एकाधिकार है। सब कुछ सिर्फ एक ही व्यक्ति तय करता है। मैं पिछले चार सालों से कह रही हूं कि मेरी भी एक अकादमी है। मुझे अंडर-19 या सीनियर कैंप मत दो, मुझे अंडर-13 या अंडर-15 के खिलाड़ी दो। मुझे भी शामिल करो। बच्चे अच्छा खेलेंगे, और फिर वे भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।"

गुट्टा के अनुसार, उनकी अकादमी में ट्रेनिंग लेने वाले खिलाड़ियों को अक्सर उनकी बेबाक छवि की वजह से अलग नजर से देखा जाता है। उन्होंने कहा, "जो भी ज्वाला गुट्टा अकादमी में ट्रेनिंग लेता है, वह 'विद्रोही' बन जाता है। उन्होंने मेरी ऐसी ही छवि बना रखी है।"

14 बार की नेशनल चैंपियन ने भारत में डबल्स बैडमिंटन को पहचान दिलाने में अपनी भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि आज के खिलाड़ियों को जो भी मौके मिल रहे हैं, उनकी नींव उनके करियर के दौरान ही रखी गई थी।

उन्होंने कहा, "अगर 2006 में मैंने कॉमनवेल्थ गेम्स में कोई मेडल नहीं जीता होता, तो बैडमिंटन खिलाड़ियों को प्राथमिकता सूची में जगह नहीं मिलती। आज जूनियर खिलाड़ियों को जितने भी एक्सपोजर ट्रिप (विदेश दौरे) मिल रहे हैं, वे सब मेरे द्वारा डबल्स खिलाड़ी के तौर पर दिखाए गए रास्ते की ही देन हैं।"

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हाल के वर्षों में डबल्स बैडमिंटन में भारत की बढ़ती सफलता के बावजूद, गुट्टा का मानना ​​है कि इस विधा को अभी भी वह तवज्जो नहीं मिल रही, जिसकी वह हकदार है।

देश में महिला डबल्स की मौजूदा स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, "किसी को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि वे बस अपना खेल खेलने में लगे हैं। वे इस बात पर चर्चा नहीं कर रहे कि सिस्टम को बेहतर कैसे बनाया जाए।"

गुट्टा ने बिना किसी संस्थागत सहयोग के एक विश्व-स्तरीय बैडमिंटन अकादमी चलाने में आने वाली आर्थिक चुनौतियों के बारे में भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा, "हैदराबाद में मेरी एकेडमी देश की सबसे बड़ी अकादमियों में से एक है। मेरे पास 50,000 वर्ग फुट में फैले 14 कोर्ट हैं और मैंने यह सब अकेले बनाया है। फिर भी, मुझे कोई मदद नहीं मिल रही है।"

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जब गुट्टा से पूछा गया कि क्या उन्होंने मदद के लिए खेल मंत्रालय से संपर्क किया था, तो पूर्व खिलाड़ी ने माना कि उन्होंने शुरू में कोशिश की थी, लेकिन सिस्टम के अंदर उनकी जो छवि है, वह उनके खिलाफ काम करती है।

गुट्टा ने दावा किया, "मैंने शुरू में कोशिश की थी, लेकिन उनका रवैया बहुत अच्छा नहीं था। मेरी छवि अच्छी नहीं है।"

भारत की इस पूर्व स्टार खिलाड़ी ने आगे तर्क दिया कि भारतीय खेल जगत में अक्सर ईमानदारी और सीधेपन के बजाय छवि प्रबंधन और कूटनीति को ज्यादा इनाम मिलता है, खासकर महिला खिलाड़ियों के मामले में।

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गुट्टा ने अपनी राय जाहिर करते हुए कहा, "मेरा काम सिर्फ बैडमिंटन खेलना है। यही मेरा सीधापन है। इसीलिए लोग मुझसे बात करते हैं, क्योंकि मैं सीधी बात करती हूं। मैं छिपकर कोई काम नहीं करती, और न ही किसी से बेतुकी बात करती हूं। अगर मैं कहती हूं कि मैं सीधी बात करती हूं, तो यह विवादित हो जाता है। एक पुरुष और एक महिला में फर्क होता है। अगर मैं ऐसा कहती हूं, तो यह विवादित हो जाता है, लोगों को यह पसंद नहीं आता।"

उन्होंने इस बात पर भी निराशा जाहिर की है कि भारतीय बैडमिंटन में उनके अहम योगदान के बावजूद उन्हें 'पद्म श्री' नहीं मिला। गुट्टा के मुताबिक, सार्वजनिक छवि और पीआर (पब्लिक रिलेशन) अक्सर खेल की काबिलियत पर भारी पड़ जाते हैं।

उन्होंने कहा, "मुझे पद्म श्री नहीं मिला। अगर मैं आपको अपनी उपलब्धियों की लिस्ट भेजूं, तो आप हैरान रह जाएंगे कि मुझे पद्म श्री क्यों नहीं मिला। मुझे पद्म श्री क्यों नहीं मिल रहा है? क्योंकि मैंने पीआर नहीं किया, मैंने गरीबी और संघर्ष के बारे में रोना नहीं रोया, जबकि मैंने यह सब झेला है। मैंने कड़ी मेहनत की, मैंने 10 घंटे ट्रेनिंग की, लेकिन कोई इस पर यकीन नहीं करता, क्योंकि मैं जैसी दिखती हूं, उसकी वजह से लोग ऐसा नहीं मानते।"

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उन्होंने इस बात पर भी निराशा जाहिर की है कि भारतीय बैडमिंटन में उनके अहम योगदान के बावजूद उन्हें 'पद्म श्री' नहीं मिला। गुट्टा के मुताबिक, सार्वजनिक छवि और पीआर (पब्लिक रिलेशन) अक्सर खेल की काबिलियत पर भारी पड़ जाते हैं।

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अपनी पीढ़ी की सोच पर बात करते हुए, गुट्टा ने आगे कहा कि उनके ज़माने के एथलीटों का मानना ​​था कि सिर्फ अच्छा प्रदर्शन करने से ही पहचान मिलेगी। उन्होंने कहा, "हम ऐसी पीढ़ी से आते हैं जहां हमारा मानना ​​था कि अगर आप अच्छा प्रदर्शन करेंगे, तो बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा। मेरा फर्ज सिर्फ अच्छा बैडमिंटन खेलना था। मुझे नहीं पता था कि पीआर इतना जरूरी होता है। अगर मुझे पता होता, तो मैं गानों पर नाचती और रील्स बनाती।"

Article Source: IANS

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