भारत के पारंपरिक खेल 'खो-खो' में फुर्ती, रणनीति और टीमवर्क की अहम भूमिका होती है। सीमित मैदान पर खेला जाने वाला फिटनेस और अनुशासन का यह खेल खिलाड़ियों की गति, संतुलन और निर्णय क्षमता को निखारता है।
माना जाता है कि खो-खो की जड़ें महाराष्ट्र से जुड़ी हैं, लेकिन महाभारत काल में भी इसका जिक्र है, जहां रथों पर खेले जाने वाले 'राठेरा' जैसा खेल इसका आधार बना। साल 1914 में पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब ने खो-खो के आधुनिक रूप को डिजाइन किया। इस दौरान खेल के लिए नियम भी बनाए गए।
1936 बर्लिन ओलंपिक में खो-खो को प्रदर्शनी खेल के तौर पर शामिल किया गया। हालांकि, यह आधिकारिक प्रतिस्पर्धी खेल नहीं था। 1955 में खो खो फेडरेशन ऑफ इंडिया (केकेएफआई) की स्थापना की गई। 1959-60 में पहली बार पहली ऑल इंडिया खो-खो चैंपियनशिप का आयोजन किया गया। विमेंस नेशनल चैंपियनशिप 1960-61 में आयोजित हुई।