आईएस बिंद्रा (IS Bindra) के निधन से भारतीय क्रिकेट ने एक बड़ा एडमिनिस्ट्रेटर खो दिया है। BCCI के पूर्व प्रेसिडेंट, इंद्रजीत सिंह बिंद्रा का 84 साल की उम्र में निधन हो गया। भारतीय क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेशन में वे कितने असरदार थे इस बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। उनका क्रिकेट से जुड़ाव चार दशक से भी ज्यादा का रहा। ये एक ऐसा दौर था जिसमें कई किस्से हुए, डेवलपमेंट देखा और भारतीय क्रिकेट को आगे प्रोफेशनल दौर में ले जाने की कार्रवाई हुई।

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कई जानकार का मानना है कि जगमोहन डालमिया या बिंद्रा जी जैसे व्यक्ति अगर आज भारतीय क्रिकेट में होते तो न तो आईसीसी 2026 टी20 वर्ल्ड कप में बांग्लादेश के हिस्सा लेने और न ही पाकिस्तान के भारत से कोलंबो में मैच खेलने से इनकार का मसला इतना उछलता कि किसी भी पार्टी के लिए यू टर्न मुश्किल हो जाता। इन दिनों जो हुआ उसे 'ड्रामा' कहना किसी हद तक गलत न होगा और सबसे ज्यादा नुकसान क्रिकेट की प्रतिष्ठा को हुआ।

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आईएस बिंद्रा 'मुद्दों' से निपटना और आगे बढ़ना खूब जानते थे और इसीलिए उन्हें इंटरनेशनल क्रिकेट में इंडिया की जगह मजबूत करने में ख़ास भूमिका निभाने के लिए याद किया जाता है।

फरवरी 1984 में, इंडिया के पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी नई दिल्ली में अपना बेनिफिट मैच (जो BCCI ने अलॉट किया था) आयोजित करने की उलझनों की मुश्किल में थे। दो दिन, नई दिल्ली के मशहूर जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में लाइट्स में क्रिकेट खेलना था, क्योंकि तब फ्लड लाइट्स में यहीं क्रिकेट खेलने की शुरुआत हो चुकी थी। ये कोई क्रिकेट स्टेडियम नहीं था। मैचों (या टॉप इंटरनेशनल क्रिकेटरों के आने से) से कुछ घंटे पहले, बेदी पाजी को मैसेज मिला कि इस स्टेडियम में क्रिकेट खेलने में कुछ अड़चन आ रही है और उन्हें मैच यहां से हटाने होंगे।

ऐसे में उनका परेशान होना स्वाभाविक था। वे उसी क्षण भागे। वे स्टेडियम या SAI के ऑफिस (जिनके कंट्रोल में ये स्टेडियम है) नहीं गए, सीधे राष्ट्रपति भवन गए जहां आईएस बिंद्रा, एक IAS ऑफिसर होने के नाते, भारत के राष्ट्रपति के स्पेशल सेक्रेटरी के तौर पर पोस्टेड थे। बंद दरवाजों के पीछे जो भी हुआ उसे छोड़ दें, तब भी नतीजा ये रहा कि कुछ ही मिनट में बेदी पाजी के चेहरे पर मुस्कान वापस लौट आई थी।

* आईएस बिंद्रा 1993 से 1996 तक BCCI प्रेसिडेंट रहे।
* वह पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के लंबे समय तक (1978–2014) प्रेसिडेंट रहे।

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उनके पास विज़न था। अगर रांची को दुनिया के क्रिकेट नक़्शे पर लाने का श्रेय धोनी को जाता है, तो आईएस बिंद्रा के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के विज़न ने मोहाली को PCA स्टेडियम (जिसे बाद में 2015 में उनके सम्मान में आईएस बिंद्रा स्टेडियम का नाम मिला) बनाने के साथ दुनिया के क्रिकेट मैप पर नई पहचान दिलाई। कई सालों तक ये भारत का नंबर 1 स्टेडियम गिना गया और यहां की पिच को भारत में सबसे बेहतर गिनते थे। उन्होंने IPL के लिए ललित मोदी को पूरा सपोर्ट किया और तभी ये सपना साकार हुआ।

भारतीय क्रिकेट और क्रिकेट में तब नया बना 'एशियन ब्लॉक' हमेशा डालमिया-बिंद्रा युग का ऋणी रहेगा (इसमें कोई शक नहीं कि BCCI, PCB और श्रीलंका क्रिकेट के कुछ और दूसरे दूरदर्शी ऑफिशियल से भी उन्हें पूरा सपोर्ट मिला) जो क्रिकेट को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के कंट्रोल से आजाद करा पाए और एशियन क्रिकेट लॉबी एक नई पहचान और मजबूती के साथ सामने आई। आज BCCI के जिस प्रभुत्व की बात करते हैं, उसकी शुरूआत वहीं से हुई थी। 1987 का क्रिकेट वर्ल्ड कप, भारत और पाकिस्तान ने मिलकर आयोजित किया (पहली बार यह टूर्नामेंट इंग्लैंड के बाहर हुआ)। भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका ने मिलकर 1996 का क्रिकेट वर्ल्ड कप आयोजित किया। ICC का संविधान बदला गया जिससे भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट ऑफिशियल का ICC प्रेसिडेंट की कुर्सी पर बैठने का रास्ता बना।

PCB और ICC के पूर्व प्रेसिडेंट, एहसान मनी, आईएस बिंद्रा को श्रद्धांजलि देते हुए लिखते हैं: ‘मुझे बताया गया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच पॉलिटिकल टेंशन की वजह से उस टूर्नामेंट (1987 का वर्ल्ड कप) का खेलना संकट में पड़ रहा था। बिंद्रा, जो एक सीनियर ब्यूरोक्रेट और भारत के प्रेसिडेंट के पूर्व स्पेशल सेक्रेटरी थे, अच्छी तरह जानते थे कि भारत और पाकिस्तान में चीजें कैसे काम करती हैं। उन्होंने जाहिर तौर पर सीधे पाकिस्तान के प्रेसिडेंट जनरल ज़िया-उल-हक को सुझाव दिया कि वह दोनों देशों के बीच 1986-87 की टेस्ट सीरीज़ के दौरान अचानक भारत आएं। बिना किसी सरकारी निमंत्रण, वे आ भी गए। जनरल ज़िया के इस विजिट को बाद में 'क्रिकेट डिप्लोमेसी' का नाम मिला और इस एक विजिट ने इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे ICC मेंबर्स (जो वर्ल्ड कप पर इन दोनों देशों के बीच टेंशन के असर का मुद्दा उछाल रहे थे) को चुप करा दिया।'

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ये सब वे कर सके क्योंकि वह एक सरकारी फीताशाही में बंधे, भारतीय क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेटर नहीं थे। इसलिए कभी-कभी तो ये भी लगा कि वे इस दुनिया में 'मिसफिट' हैं। डालमिया और बिंद्रा ने दोस्तों के तौर पर मिलकर काम किया क्रिकेट की दुनिया को चैलेंज किया। समय के साथ इस दोस्ती की भी शेल्फ लाइफ खत्म हो गई। ये दोनों भी BCCI की अंदरूनी और अहंकार की लड़ाई में फंस गए। विरोधी गुट में थे और इतने कट्टर विरोधी कि BCCI चीफ के तौर पर डालमिया ने ही आईएस बिंद्रा को BCCI से सस्पेंड करवा दिया। बाद में आईएस बिंद्रा ने बंगाल के इस बड़े 'प्लेयर' को BCCI से बाहर की रास्ता दिखाने की सही चालें चलीं। इस खराब रिश्ते का असर पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन पर भी पड़ा।

इसी तरह आईएस बिंद्रा पर मोहाली में स्टेडियम के लिए, अपने रुतबे और पद का इस्तेमाल कर, ज़रूरी शर्तें पूरी किए बिना जमीन लेने और स्टेडियम बनवाने का आरोप लगा। एक समय तो पंजाब सरकार ने स्टेडियम खाली करने का ऑर्डर भी जारी कर दिया था। यही वह सबसे बड़ी वजह थी कि PCA ने मुल्लांपुर में अपना स्टेडियम बनवाया और सारा क्रिकेट वहीं शिफ्ट कर दिया।

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चरनपाल सिंह सोबती

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Charanpal Singh Sobti
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