ICF CANOE SLALOM WORLD CHAMPIONSHIPS: ओलंपिक में खेले जाने वाले रोमांचक वाटर स्पोर्ट्स में 'कैनो स्लैलम' भी शामिल है, जिसमें खिलाड़ी (कयाक) तेज बहाव वाली नदी में बने कृत्रिम या प्राकृतिक गेट्स के बीच से नाव चलाते हैं। इस खेल में संतुलन, गति और दिशा नियंत्रण बेहद जरूरी होता है। कयाक कम समय में बिना गलती गेट पार कर जीत हासिल करता है।
इस खेल में कैनो एक छोटी नाव को कहते हैं, जिसमें कयाक घुटनों के बल बैठकर सिंगल-ब्लेड चप्पू का इस्तेमाल करता है।
कैनो स्लैलम की शुरुआत 1930 में स्विट्जरलैंड में हुई थी, लेकिन उस समय में यह प्रतियोगिता शांत पानी (फ्लैटवाटर) में होती थी। साल 1946 में इंटरनेशनल कैनो फेडरेशन (आईसीएफ) का गठन हुआ और करीब 3 साल बाद साल 1949 में पहली वर्ल्ड चैंपियनशिप आयोजित की गई।
1960 और 1970 के बीच कृत्रिम व्हाइट वाटर कोर्स का निर्माण हुआ। 1970 के दशक में नाव को हल्का और तेज बनाने के लिए 'केवलर' और 'कार्बन फाइबर' का इस्तेमाल शुरू हुआ। 1972 म्यूनिख ओलंपिक में पहली बार कैनो स्लैलम को प्रदर्शनी खेल के रूप में शामिल किया गया। 1992 ओलंपिक गेम्स में यह मेडल गेम बना।
2016 रियो ओलंपिक तक इसमें चार इवेंट थे, जिनमें सी-1 कैनो, के-1 कायक, सी-2 कैनो (मेंस डबल्स) और के-1 कायक (विमेंस) शामिल थे। इसके बाद 2020 टोक्यो ओलंपिक में सी-2 को विमेंस सी-1 प्रतियोगिता में बदल दिया गया।
आज के दौर में 300 मीटर तक की दूरी वाले कोर्स इस तरह पूरे किए जाते हैं कि प्रमुख एथलीट्स 90-110 सेकंड के बीच पूरा कर सकें। इस दौरान अधिकतम 25 अपस्ट्रीम (पानी की धारा के विपरीत) और डाउनस्ट्रीम (पानी की धारा की दिशा में) को कम से कम समय में पार करना होता है।
एक गेट (नदी के ऊपर लटकते हुए डंडे) को छूने के लिए टाइम पेनाल्टी दो सेकंड होती है, जबकि एक गेट छूट जाए या उसे गलत दिशा से पार किया जाए, तो 50 सेकंड की पेनाल्टी लगती है।
आज के दौर में 300 मीटर तक की दूरी वाले कोर्स इस तरह पूरे किए जाते हैं कि प्रमुख एथलीट्स 90-110 सेकंड के बीच पूरा कर सकें। इस दौरान अधिकतम 25 अपस्ट्रीम (पानी की धारा के विपरीत) और डाउनस्ट्रीम (पानी की धारा की दिशा में) को कम से कम समय में पार करना होता है।
Also Read: LIVE Cricket Score
कैनो स्लैलम में तेजी, संतुलन और रणनीति का अनोखा मिश्रण है, जिससे एथलीट्स की तकनीकी क्षमता में सुधार हुआ है। इसके अलावा, इस खेल ने फिटनेस और मानसिक एकाग्रता को भी बढ़ावा दिया। ओलंपिक खेल में शामिल होने के बाद इसकी वैश्विक पहचान और भी बढ़ी, जिससे कई देशों में इसकी ट्रेनिंग और सुविधाओं का विकास हुआ।