कई खिलाड़ियों को विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने से पहले कई लड़ाइयां लड़नी पड़ती हैं। भारत की होनहार महिला पहलवान पूजा गहलोत ने अखाड़े में उतरने से पहले कई ऐसी ही 'जंग' लड़ी। आर्थिक तंगी के साथ-साथ पूजा के पिता उन्हें कुश्ती खेलते हुए नहीं देखना चाहते थे। हालांकि, पूजा के बुलंद हौसलों के आगे एक दिन पिता को भी झुकना पड़ा।
पूजा गहलोत का जन्म दिल्ली के लांपुर गांव में हुआ। बचपन से ही पूजा को खेलों में खास रुचि थी। कुश्ती का खेल पूजा के दिल के थोड़ा ज्यादा करीब था। हालांकि, उस दौर में लड़कियों का कुश्ती खेलना सामान्य बात नहीं माना जाता था। खुद पूजा के पिता नहीं चाहते थे कि वह इस खेल में करियर बनाएं। पूजा की प्रतिभा को चाचा धर्मवीर सिंह ने पहचाना, और वह ही उनको महज 6 साल की उम्र में अखाड़े लेकर गए।
पिता की सख्ती के चलते पूजा ने पहले वॉलीबॉल खेलना शुरू किया लेकिन बाद में वह कुश्ती के खेल में रम गईं। चाचा धर्मवीर ने पूजा को कुश्ती की बारीकियां सिखाईं और इसके बाद पूजा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूजा ने 2017 में एशियन जूनियर चैंपियनशिप में लाजवाब प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक जीता।
पूजा गहलोत पहली बार साल 2019 में सुर्खियों में आईं। उन्होंने अंडर-23 विश्व चैंपियनशिप में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए रजत पदक को अपने नाम किया। इस चैंपियनशिप से पहले कंधे की चोट के कारण पूजा को दो साल तक कुश्ती से दूर रहना पड़ा था। हालांकि, पूजा ने जबरदस्त वापसी करते हुए हर किसी को दिखाया कि वह इस खेल के लिए ही बनी हुई हैं।
पिता की सख्ती के चलते पूजा ने पहले वॉलीबॉल खेलना शुरू किया लेकिन बाद में वह कुश्ती के खेल में रम गईं। चाचा धर्मवीर ने पूजा को कुश्ती की बारीकियां सिखाईं और इसके बाद पूजा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूजा ने 2017 में एशियन जूनियर चैंपियनशिप में लाजवाब प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक जीता।
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पूजा की सफलता के पीछे उनका संघर्ष, अनुशासन और दृढ़ संकल्प रहा। उन्होंने समाज की सोच, आर्थिक कठिनाइयों और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियों को पार करके विश्व में अपने खेल के दम पर अपनी पहचान बनाई। आज वह देश की युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं और यह संदेश देती हैं कि मेहनत और आत्मविश्वास से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।