'मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है; पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।' ये लाइनें भारत के पैरा एथलीट संदीप चौधरी पर एकदम फिट बैठती हैं। संदीप का वो हौसला ही था, जिसके दम पर उन्होंने खेलों की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
संदीप का जन्म 10 अप्रैल 1966 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले के मेहाड़ा जाटूवांस में हुआ। महज 12 साल की उम्र में संदीप एक कार दुर्घटना का शिकार हो गए थे, जिसमें बाएं कूल्हे के जोड़ में गंभीर चोट आई और वह शारीरिक रूप से अक्षम हो गए। हालांकि, इसके बावजूद संदीप ने हार मानी और खेलों के प्रति अपनी रुचि को बनाए रखा। संदीप शुरुआत में फुटबॉल के खेल में गोलकीपर की भूमिका निभाते थे। संदीप की बाहों में इतनी ताकत थी कि वह फुटबॉल को हाथों से ही आधे मैदान पर फेंक दिया करते थे।
'मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है; पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।' ये लाइनें भारत के पैरा एथलीट संदीप चौधरी पर एकदम फिट बैठती हैं। संदीप का वो हौसला ही था, जिसके दम पर उन्होंने खेलों की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
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2018 में हुए एशियाई पैरा खेलों में संदीप पहली बार सुर्खियों में आए। उन्होंने 60.01 मीटर का थ्रो फेंककर स्वर्ण पदक को अपने नाम किया। वहीं, इसके ठीक एक साल बाद, यानी 2019 में, संदीप ने विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 66.18 मीटर का थ्रो फेंकते हुए न सिर्फ स्वर्ण पदक जीता, बल्कि नया विश्व रिकॉर्ड भी बना डाला। 2020 में हुए टोक्यो पैरा ओलंपिक और 2024 में खेले गए पेरिस ओलंपिक में भी संदीप ने देश का प्रतिनिधित्व किया। पेरिस ओलंपिक में संदीप चौथे स्थान पर रहे। साल 2024 में विश्व पैरा एथलेटिक्स 2024 में संदीप ने कांस्य पदक को अपने नाम किया। संदीप से आने वाले वर्षों में देश को कई और मेडल की आस होगी। साल 2020 में संदीप को 'अर्जुन अवॉर्ड' से भी सम्मानित किया जा चुका है।