आपने कई भारतीय क्रिकेटर्स को विदेश में जाकर दूसरे देशों के लिए क्रिकेट खेलते देखा होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक वेस्टइंडीज में जन्मा क्रिकेटर भी भारतीय क्रिकेट टीम के लिए इंटरनेशनल स्तर पर क्रिकेट खेला और अपने खेल से अलग पहचान बनाने में सफल रहा। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारतीय क्रिकेटर रॉबिन सिंह की, जिनका नाम हमेशा एक ऐसे खिलाड़ी के तौर पर याद किया जाएगा, जिसने अपनी मेहनत और जुनून के दम पर अलग पहचान बनाई। वेस्टइंडीज के त्रिनिदाद में जन्मे रॉबिन का सपना बचपन से बड़ा क्रिकेटर बनने का था, लेकिन उन्हें पता था कि उस समय वेस्टइंडीज टीम में जगह बनाना बेहद मुश्किल था। ऐसे में उन्होंने भारत आने का फैसला किया और चेन्नई में अपनी नई शुरुआत की। रॉबिन सिर्फ 17 साल की उम्र में भारत आए थे। शुरुआत में उनका भारत के लिए खेलने का कोई प्लान नहीं था। वो पढ़ाई भी कर रहे थे और क्रिकेट भी खेल रहे थे। इसके बाद धीरे-धीरे उन्हें यूनिवर्सिटी क्रिकेट खेलने का मौका मिला और फिर तमिलनाडु टीम में जगह मिल गई। पांच साल तक इंतजार करने के बाद उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल की और यहीं से उनका भारतीय क्रिकेट सफर शुरू हुआ। 1989 में उन्हें पहली बार भारतीय टीम में मौका मिला। खास बात ये रही कि उनका डेब्यू वेस्टइंडीज दौरे पर हुआ, यानि उसी देश के खिलाफ जहां वो पैदा हुए थे। हालांकि शुरुआती दौर आसान नहीं था। कुछ मैच खेलने के बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया। लेकिन रॉबिन ने हार नहीं मानी और घरेलू क्रिकेट में लगातार मेहनत करते रहे। इसके बाद उन्होंने रणजी ट्रॉफी में शानदार प्रदर्शन किया। तमिलनाडु के लिए खेलते हुए उन्होंने बल्ले और गेंद दोनों से कमाल दिखाया। पंजाब के खिलाफ उनकी 152 रन की पारी और रेलवे के खिलाफ फाइनल में 131 रन आज भी याद किए जाते हैं। उसी सीजन तमिलनाडु ने रणजी ट्रॉफी जीती थी। रॉबिन सिंह को बाद में भारतीय टीम का सबसे भरोसेमंद ऑलराउंडर माना जाने लगा। उनकी फील्डिंग उस दौर में अलग ही स्तर की थी। मोहम्मद अजहरुद्दीन के साथ उनकी जोड़ी मैदान पर काफी मशहूर रही। लोग उन्हें खासकर वनडे क्रिकेट के लिए याद करते हैं। हालांकि रॉबिन खुद मानते थे कि उन्हें “वनडे स्पेशलिस्ट” का टैग दे दिया गया, जबकि वो लंबे फॉर्मेट में भी अच्छा कर सकते थे। 35 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला टेस्ट मैच खेला। भले ही टेस्ट करियर लंबा नहीं चला, लेकिन भारत के लिए खेलना उनके लिए सबसे बड़ा गर्व था। उन्होंने 100 से ज्यादा वनडे मैच खेले और 1999 वर्ल्ड कप में भी भारत का हिस्सा रहे। क्रिकेट से रिटायर होने के बाद रॉबिन ने कोचिंग में कदम रखा। वो भारतीय टीम के फील्डिंग कोच भी बने और बाद में मुंबई इंडियंस के साथ जुड़ गए। आज भी रॉबिन सिंह की कहानी उन खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है, जो संघर्ष के बावजूद अपने सपनों को छोड़ते नहीं हैं।