भारतीय हॉकी का इतिहास स्वर्णिम रहा है। इस स्वर्णिम इतिहास के बड़े चेहरों में एक नाम जयपाल सिंह मुंडा का है। जयपाल सिंह भारतीय हॉकी का बड़ा चेहरा रहे हैं और ओलंपिक में भारतीय टीम की कप्तानी कर चुके हैं। एक खिलाड़ी के तौर पर बड़ी सफलता पाने के बाद वह राजनीति के क्षेत्र में आए और वहां भी लंबी पारी खेली। जयपाल सिंह ने आदिवासियों के अधिकारों के लिए भी लंबी लड़ाई लड़ी।
जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को रांची में हुआ था। उन्हें प्रमोद पाहन के नाम से भी जाना जाता है। हॉकी को लेकर बचपन से ही जयपाल सिंह मुंडा में लगाव था। अपनी प्रतिभा और क्षमता के दम पर वह भारतीय हॉकी टीम के सदस्य बने। वह डिफेंडर के तौर पर खेलते थे। 1928 में एम्सटर्डम में खेले गए ओलंपिक में वह भारतीय टीम के कप्तान थे। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने 17 लीग स्टेज मैचों में 16 में जीत हासिल की थी, जबकि एक मैच ड्रॉ रहा था। इंग्लिश टीम मैनेजर ए. बी. रॉसर के साथ विवाद की वजह से वह नॉकआउट मैचों में नहीं खेले थे। फाइनल में भारत ने हालैंड को हराकर स्वर्ण पदक जीता था।
1929 में उन्होंने अपनी टीम बनाई और अलग-अलग प्रतियोगिताओं में उसका नेतृत्व किया।