T20 World Cup: टी20 वर्ल्ड कप 2026 जिम्बाब्वे के क्रिकेट इतिहास के लिए बेहद खास रहा है। मगर यहां तक का सफर इस देश के लिए आसान नहीं रहा है। 18 अप्रैल 1980 को यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) से आधिकारिक स्वतंत्रता मिलने के बाद जिम्बाब्वे ने जुलाई 1981 में आईसीसी के एसोसिएट सदस्य के तौर पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में प्रवेश किया था।

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साल 1983 में जिम्बाब्वे ने पहली बार वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया और अपने पहले ही मैच में ऑस्ट्रेलिया को मात देकर सभी को चौंकाया, तब से 1992 तक इस टीम ने 3 विश्व कप खेले। साल 1992 में इस टीम को पूर्ण सदस्य का दर्जा मिल गया था।

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साल 1994-95 में अपने 11वें टेस्ट मैच में जिम्बाब्वे ने पहली जीत दर्ज कर ली। हालांकि, अगली जीत के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। इस टीम ने 1998-99 में हरारे में भारत को रोमांचक मुकाबले में मात दी थी। इसके तुरंत बाद जिम्बाब्वे ने पाकिस्तान को पेशावर में मात देकर पहली बार घर से बाहर टेस्ट सीरीज अपने नाम की। इससे पहले, 1996/97 में इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे का दौरा किया, जहां 0-3 से सीरीज गंवा दी।

उस दौर में 'फ्लावर बंधु' इस टीम की जान थे। एंडी फ्लावर ने इस देश के लिए 63 टेस्ट मुकाबलों में 51.54 की औसत के साथ 4,794 रन बनाए, जबकि 213 वनडे मुकाबलों में 4 शतकों के साथ 4,794 रन जुटाए। दूसरी ओर, ग्रांट फ्लावर ने 67 टेस्ट मुकाबलों में 3,457 रन बनाने के साथ 221 वनडे मुकाबलों में 6,571 रन टीम के खाते में जोड़े।

2003 के आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप में जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों के पास अपनी छाप छोड़ने का शानदार मौका था, लेकिन जिम्बाब्वे क्रिकेट गंभीर विवादों में घिर गया। क्रिकेट के बढ़ते राजनीतिकरण और देश में बिगड़ते हालात ने 2003 क्रिकेट वर्ल्ड कप में खलल डाला। टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी एंडी फ्लावर और हेनरी ओलोंगा ने काली पट्टी बांधकर मैदान में उतरते हुए देश में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में मौन विरोध दर्ज कराया। इस कदम से जिम्बाब्वे सरकार नाराज हुई और दोनों खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ा। नतीजतन, उन्हें देश छोड़ना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय करियर लगभग समाप्त हो गया। यह विवाद खेल और राजनीति के टकराव का प्रतीक बना, जिसने जिम्बाब्वे क्रिकेट को लंबे समय तक प्रभावित किया।

इसके बाद यह टीम साल 2009 में ब्रिटिश सरकार और जिम्बाब्वे सरकार के बीच राजनीतिक विवाद के चलते टी20 विश्व कप नहीं खेल सकी थी। ये वो वक्त था, जब ब्रिटिश सरकार ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियो को वीजा देने से ही इनकार कर दिया था। इसके बाद आईसीसी ने मामले में हस्तक्षेप किया और जिम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड के साथ बातचीत की।

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फैसला हुआ कि आईसीसी जिम्बाब्वे को पूरा फंड देने के साथ पूर्ण सदस्यता भी देगी। इसके बदले जिम्बाब्वे टी20 वर्ल्ड कप 2009 में हिस्सा न लेने के लिए तैयार हुआ।

इसके बाद जिम्बाब्वे ने साल 2010, 2012, 2014 और 2016 में टी20 वर्ल्ड कप खेला, लेकिन प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। साल 2021 में यह टीम टी20 वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई तक नहीं कर सकी।

साल 2022 में इस टीम ने वर्ल्ड कप में वापसी करते हुए आयरलैंड (31 रन), स्कॉटलैंड (5 विकेट) और पाकिस्तान (1 रन) को शिकस्त देकर सुपर-12 में जगह बनाई, लेकिन इससे आगे नहीं बढ़ सकी।

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टी20 वर्ल्ड कप 2024 से पहले टीम का प्रदर्शन फिर से गिरा और उसे वर्ल्ड कप का टिकट हासिल नहीं हो सका, जो उसके फैंस के लिए बड़ा झटका था। खिलाड़ियों ने अगले 18 महीने अपने प्रदर्शन को सुधारा और अफ्रीकन रीजन से टी20 वर्ल्ड कप 2026 के लिए क्वालीफाई किया।

दुनिया यह मान बैठी थी कि एक बार फिर जिम्बाब्वे ग्रुप स्टेज खेलकर अपना विश्व कप सफर खत्म करेगी, लेकिन इस बार टीम में नया जोश था।

टी20 वर्ल्ड कप 2026 के एक ऐसे ग्रुप में जिसमें ऑस्ट्रेलिया जैसी बड़ी टीम और श्रीलंकाई जैसी एक ऐसी टीम थी, जो अपने होम-फील्ड एडवांटेज के साथ खेल रही थी, जिम्बाब्वे ने साफतौर पर दबदबा बनाया है।

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इस टीम ने ग्रुप स्टेज के अपने पहले मैच में ओमान को 8 विकेट से मात दी। अगले मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया को 23 रन से हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया। इससे पहले जिम्बाब्वे ने टी20 वर्ल्ड कप 2007 में भी कंगारू टीम को चौंकाया था।

जिम्बाब्वे का अगला ग्रुप स्टेज मैच आयरलैंड के खिलाफ था, जो बारिश के चलते रद्द हो गया। इसी के साथ जिम्बाब्वे ने सुपर-8 में जगह बना ली।

जिम्बाब्वे की टीम जोश से लबरेज थी और अपने अंतिम ग्रुप स्टेज मैच में श्रीलंका के खिलाफ 179 रनों का पीछा करते हुए 6 विकेट से जीत दर्ज करते हुए एक बार फिर से दुनिया को अपनी क्षमता का अहसास करवा दिया। हालांकि, सुपर-8 में उसके सामने वेस्टइंडीज, भारत और साउथ अफ्रीका जैसी टीमें थीं, जहां इस टीम ने हारकर भी फैंस का दिल जीत लिया।

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इस टीम ने छोटे-छोटे सुधार करते हुए गेंद, बल्ले और फील्ड में अपना प्रदर्शन सुधारा। पुराने और सीनियर खिलाड़ियों ने युवाओं को निखारा। इस बीच 22 वर्षीय ब्रायन बेनेट सुपरस्टार के तौर पर उभरे, जिन्होंने 48*, 64*, 63* और 97* जैसी शानदार पारियां खेलीं। गेंदबाजी में ब्लेसिंग मुजरबानी वाकई टीम के लिए वरदान साबित हुए। 39 वर्षीय कप्तान सिकंदर रजा का अनुभव वाकई टीम के काम आया, जिन्होंने कप्तान के साथ ऑलराउंडर की दोहरी भूमिकाएं निभाईं। दबाव के क्षणों में रन बनाना और अहम ओवरों में गेंदबाजी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

जिम्बाब्वे का उत्थान किसी एक मैच या खिलाड़ी का नतीजा नहीं, बल्कि मजबूत नेतृत्व, युवा जोश, रणनीतिक सोच और निरंतरता का परिणाम है। यही वजह है कि टी20 वर्ल्ड कप 2026 में उन्हें एक सरप्राइज नहीं, बल्कि एक गंभीर चुनौती के रूप में देखा गया।

इस टीम ने छोटे-छोटे सुधार करते हुए गेंद, बल्ले और फील्ड में अपना प्रदर्शन सुधारा। पुराने और सीनियर खिलाड़ियों ने युवाओं को निखारा। इस बीच 22 वर्षीय ब्रायन बेनेट सुपरस्टार के तौर पर उभरे, जिन्होंने 48*, 64*, 63* और 97* जैसी शानदार पारियां खेलीं। गेंदबाजी में ब्लेसिंग मुजरबानी वाकई टीम के लिए वरदान साबित हुए। 39 वर्षीय कप्तान सिकंदर रजा का अनुभव वाकई टीम के काम आया, जिन्होंने कप्तान के साथ ऑलराउंडर की दोहरी भूमिकाएं निभाईं। दबाव के क्षणों में रन बनाना और अहम ओवरों में गेंदबाजी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

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इस बीच जिम्बाब्वे के घरेलू ढांचे में सुधार हुआ और इस टीम को ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैचों का अनुभव मिला। आईसीसी की विकास योजनाओं से भी टीम को फायदा मिला। शुरुआती जीत ने टीम का मनोबल बढ़ाया है।

Article Source: IANS

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