एक नई खबर: मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन ने 'टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट ऑफिसर' (TRDO) विंग बनाई और अपने पूर्व चीफ सेलेक्टर संजय पाटिल को इसका पहला चेयरमैन बनाया। इसी तरह से उन्होंने, भारत की पूर्व क्रिकेटर लाया फ्रांसिस को TRDW की महिला विंग का चीफ बनाया।
TRDW क्या है? ये क्रिकेट के नए और छिपे टैलेंट को खोजने और उसे चमकाने का एक सिस्टम है। TRDW कोई ट्रेडमार्क नहीं कि कोई ख़ास ही इसका इस्तेमाल कर सकते हैं पर भारतीय क्रिकेट में TRDW या TRDO का ज़िक्र आते ही सीधे बीसीसीआई की 'टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट विंग' (TRDW) के पहले चीफ के तौर पर भारत के पूर्व कप्तान दिलीप वेंगसरकर के शानदार काम की याद आ जाती है। ये एक गजब की कोशिश थी और इसने देश के हर कोने से नए टैलेंट को खोजने में मदद की। ये सिस्टम बीसीसीआई में 2002 से 2006 तक चला और महेंद्र सिंह धोनी, इशांत शर्मा, सुरेश रैना, पीयूष चावला, आरपी सिंह तथा कई और क्रिकेटरों को गुमनामी से निकालकर सुर्खियों में ला दिया।
हैरानी की बात तो ये कि इतने अच्छे नतीजे और शानदार खिलाड़ी मिलने के बावजूद बीसीसीआई ने इस स्कीम को कुछ साल बाद बंद कर दिया। ये ऐसी कमाल की कोशिश थी कि जब 2015 में, बीसीसीआई ने भारतीय क्रिकेट की बेहतरी के लिए सलाह देने के लिए सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण की नई एडवाइजरी कमेटी बनाई तो इस कमेटी ने तब भी 'टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट ऑफिसर' (TRDO) विंग को फिर से शुरू करने की सिफारिश की थी। बीसीसीआई ने इस मुद्दे को महीनों तक लटकाए रखा और आखिर में फाइल में बंद कर दिया। इसे फिर से शुरू करने के सुझाव के पीछे उद्देश्य यही था कि एक रिहैब सेंटर बन चुकी बीसीसीआई की नेशनल क्रिकेट एकेडमी को देश के सबसे होनहार टैलेंट की ट्रेनिंग के लिए एक असली नर्सरी बनाएं तथा एनसीए की मदद के लिए जोनल एकेडमी शुरू हों। ये सोच बहरहाल बीसीसीआई को पसंद नहीं आई।
जिस आइडिया को बीसीसीआई ने फिर से न अपनाया, आईपीएल फ्रेंचाइजी ने उसे सालों बाद एक नई शक्ल और नाम देते हुए 'टैलेंट स्काउटिंग' और 'प्लेयर डेवलपमेंट' के तौर पर अपना लिया। आईपीएल टीमों ने नए टैलेंट को खोजने के लिए बीसीसीआई के सिस्टम पर भरोसा नहीं किया और अपने स्काउट बना दिए, अनजान और अनकैप्ड टैलेंट को सीधे आईपीएल में लाने के लिए। जैसी नई टैलेंट सामने आ रही है वह इस कोशिश की कामयाबी का सबूत है। वैभव सूर्यवंशी इसकी सबसे अच्छी मिसाल हैं।
जब 2002 में बीसीसीआई ने टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट विंग को बनाया तो बीसीसीआई चीफ जगमोहन डालमिया थे। क्रिकेट में इस सिस्टम को लाने का सुझाव सबसे पहले एडमिनिस्ट्रेटर मकरंद वयंगंकर (Makarand Waingankar) ने दिया था। दिलीप वेंगसरकर इस विंग के पहले चीफ बनाए और तब उन्हें 15 लाख रुपये सालाना की अच्छी सैलरी देते थे।
इस प्रोजेक्ट में हर ज़ोन के लिए, पुराने लेकिन क्रिकेट से जुड़े क्रिकेटरों और कोच को टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट ऑफिसर (TRDO) बनाया और काम था बड़े क्रिकेट सेंटर से हटकर, लोकल टैलेंट को ढूंढना। इससे भारत की टीम चुनने के लिए सिर्फ स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन का नाम भेजने वाला रोल कम हो गया। कई शिकायत आ रही थीं कि स्टेट एसोसिएशन टैलेंट से नहीं, सिर्फ 'मनपसंद' खिलाड़ियों का नाम भेजती हैं। ये टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट ऑफिसर टैलेंट खोजते थे और नाम सीधे बीसीसीआई को देश की टीम के लिए खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए भेजते थे। ये तैयारी नेशनल क्रिकेट एकेडमी के ज़रिए होती थी। महेंद्र सिंह धोनी, किसी टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट ऑफिसर के बेहतरीन टैलेंट खोजने के प्रोजेक्ट की कामयाबी की सबसे अच्छी मिसाल हैं।
असल में जब मकरंद व्यंगंकर ने सबसे पहले ऐसे सिस्टम के बारे में सोचा था तो इसका सुझाव कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन को दिया था और उन्होंने इसे 2001 में लागू कर दिया। जब बीसीसीआई चीफ जगमोहन डालमिया को इसका पता चला तो उन्होंने इसे भारतीय क्रिकेट के लिए लागू करने का फैसला किया। नतीजा: कुछ ही दिनों मेंबीसीसीआई ने टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट विंग बना दी और इसके पहले चीफ दिलीप वेंगसरकर बने और बृजेश पटेल उनके असिस्टेंट।
देश भर में लोकल जूनियर मैचों पर नज़र रखने, एक ही और बिना पक्षपात स्टैंडर्ड को अपनाते हुए, खिलाड़ियों को रेटिंग दे, सीधे नाम नेशनल जूनियर सेलेक्शन कमेटी और नेशनल क्रिकेट एकेडमी को भेजने के लिए 20 टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट ऑफिसर बना दिए। आज किसी को याद भी नहीं होगा कि 1960 के दशक में बंगाल के कप्तान रहे प्रकाश पोद्दार नाम के एक टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट ऑफिसर ने 2003 में जमशेदपुर में झारखंड के लिए एमएस धोनी नाम के एक खिलाड़ी को खेलते देखा और उसका नाम सीधे एनसीए को भेजा था। उनकी रिपोर्ट में लिखा था: 'बॉल को अच्छे से हिट करते हैं; बहुत पावर है लेकिन विकेट-कीपिंग पर काम करने की ज़रूरत है। टेक्निकली बहुत अच्छे नहीं हैं। विकेटों के बीच दौड़ने में बहुत अच्छे हैं।' इसी तरह, और भी क्रिकेट टैलेंट की पहचान की गई।
इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि बीसीसीआई में पॉवर का समीकरण बदला और जगमोहन डालमिया चीफ न रहे तो 2006 में बीसीसीआई ने टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट विंग को भी बंद कर दिया। इसके बाद, नए टैलेंट को खोजने के लिए अंडर-19 क्रिकेट पर फोकस आ गया और वही सिस्टम चल रहा है।
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2009 में, कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) ने बीसीसीआई की टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट विंग का मॉडल ज्यों का त्यों अपना लिया और अपनी टैलेंट रिसोर्स डेवलपमेंट विंग बना दी। यहां तक कि वे तो इसे लागू करने के लिए खुद मकरंद व्यंगकर को ले आए। ये बहरहाल एक अलग स्टोरी है कि वहां इस स्कीम के साथ क्या हुआ? बस इतना जान लीजिए कि टीम के तब के कोच जॉन बुकानन को लगा कि ये स्कीम तो उनके लिए चुनौती है और उनका पत्ता भी काटेगी। बस फिर क्या था, वे इस के सही तरह से लागू होने से पहले ही इसे बंद कराने के काम में जुट गए।