गुरबचन सिंह रंधावा ट्रैक एंड फील्ड खेल में भारत के सफल और लोकप्रिय एथलीट रहे हैं। रंधावा का नाम 1950 और 1960 के दशक में देश के बड़े एथलीटों में शुमार था।
गुरबचन सिंह रंधावा का जन्म 6 मई, 1939 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। बहुत ही कम उम्र में वह एथलेटिक्स में सक्रिय हो गए थे और उनकी प्रतिभा से यह साबित हो गया था कि वह भविष्य में देश को ट्रैक एंड फील्ड में बड़ी सफलता दिलाएंगे। रंधावा हर्डल्स, डेकाथलॉन, लंबी कूद और स्प्रिंट इवेंट्स में दक्ष थे। 110-मीटर हर्डल्स और डेकाथलॉन ने उन्हें बड़ी सफलता और लोकप्रियता दिलाई। ऐसे इवेंट्स में गति, ताकत और तकनीकी क्षमता का संतुलन जरूरी होता है।
इंडोनेशिया के जकार्ता में 1962 में आयोजित एशियन गेम्स में गुरबचन सिंह रंधावा ने डेकाथलॉन में स्वर्ण पदक जीता था। इस सफलता ने उन्हें उस समय एशिया के शीर्ष एथलीटों में जगह दिला दी थी। इसके अलावा, अपने करियर में रंधावा ने कॉमनवेल्थ गेम्स और कई एशियन चैंपियनशिप सहित कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व किया था।
रंधावा के लिए 1964 में टोक्यो में आयोजित ओलंपिक बेहद खास रहा था। उन्होंने 110-मीटर हर्डल्स में हिस्सा लिया था और फाइनल में पांचवें स्थान पर रहे थे। बेशक, उन्हें पदक नहीं मिला, लेकिन उनका यह प्रदर्शन ओलंपिक में ट्रैक एंड फील्ड में किसी भारतीय एथलीट द्वारा किया गए श्रेष्ठ प्रदर्शनों में एक है।
बतौर एथलीट संन्यास लेने के बाद भी रंधावा मेंटर और प्रशासक के तौर पर सक्रिय रहे हैं और ट्रैक एंड फील्ड को देश में विकसित करने में अपना अहम योगदान दिया है।
रंधावा के लिए 1964 में टोक्यो में आयोजित ओलंपिक बेहद खास रहा था। उन्होंने 110-मीटर हर्डल्स में हिस्सा लिया था और फाइनल में पांचवें स्थान पर रहे थे। बेशक, उन्हें पदक नहीं मिला, लेकिन उनका यह प्रदर्शन ओलंपिक में ट्रैक एंड फील्ड में किसी भारतीय एथलीट द्वारा किया गए श्रेष्ठ प्रदर्शनों में एक है।
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भारत सरकार ने उन्हें 1961 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था। 1961 में अर्जुन पुरस्कार की शुरुआत की गई थी और अलग-अलग श्रेणियों में 20 खिलाड़ियों को सम्मानित किया था। एथलेटिक्स में यह सम्मान गुरबचन सिंह रंधावा को मिला था। 2005 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था।