वनडे वर्ल्ड कप 1983 की विजेता टीम के अहम सदस्य रहे यशपाल शर्मा ने कठिन परिस्थितियों में देश के लिए शानदार प्रदर्शन किया है। वह क्रिकेट प्रेमियों के लिए प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं।
11 अगस्त 1954 को लुधियाना में जन्मे दाएं हाथ के बल्लेबाज यशपाल शर्मा अपने मजबूत डिफेंस से किसी भी अटैक को बेअसर करने में माहिर थे। 1977-78 में दिलीप ट्रॉफी में नॉर्थ जोन की तरफ से खेलते हुए उन्होंने साउथ जोन के खिलाफ 173 रन की पारी खेलकर अपनी पहचान बनाई। अगले सीजन में यशपाल ने पाकिस्तान का दौरा किया, लेकिन टेस्ट टीम में जगह नहीं बना सके। हालांकि, कुछ वक्त बाद टीम में आखिरकार मौका मिल ही गया।
करीब दो दशक लंबे प्रथम श्रेणी करियर में यशपाल ने 160 मैच खेले, जिसमें 44.88 की औसत के साथ 8,933 रन बनाए। इस दौरान 21 शतक और 46 अर्धशतक शामिल रहे। यशपाल ने फर्स्ट क्लास करियर में 201 रन की नाबाद पारी भी खेली है।
साल 1978 से 1985 के बीच यशपाल ने भारत के लिए 37 टेस्ट और 42 वनडे मैच खेलते हुए मिडिल ऑर्डर को मजबूती दी। इस दौरान उनके बल्ले से टेस्ट फॉर्मेट में 33.45 की औसत के साथ 1,606 रन निकले, जिसमें 2 शतक और 9 अर्धशतक शामिल रहे। वहीं, वनडे फॉर्मेट में इस बल्लेबाज ने 28.48 की औसत के साथ 883 रन बनाए। 1981-82 में यशपाल शर्मा ने इंग्लैंड के खिलाफ 140 रन बनाते हुए जीआर विश्वनाथ के साथ 316 रन की रिकॉर्ड साझेदारी की।
यशपाल वनडे वर्ल्ड कप 1983 की विजेता टीम का अहम हिस्सा रहे हैं, जो उस टूर्नामेंट में सर्वाधिक रन बनाने वाले भारतीय बल्लेबाजों के मामले में दूसरे पायदान पर रहे, उन्होंने 8 मुकाबलों में 34.29 की औसत के साथ 240 रन बनाए। यशपाल ने ग्रुप स्टेज में वेस्टइंडीज के खिलाफ 89 रन, जबकि सेमीफाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध 61 रन की पारी खेली थी।
साल 1978 से 1985 के बीच यशपाल ने भारत के लिए 37 टेस्ट और 42 वनडे मैच खेलते हुए मिडिल ऑर्डर को मजबूती दी। इस दौरान उनके बल्ले से टेस्ट फॉर्मेट में 33.45 की औसत के साथ 1,606 रन निकले, जिसमें 2 शतक और 9 अर्धशतक शामिल रहे। वहीं, वनडे फॉर्मेट में इस बल्लेबाज ने 28.48 की औसत के साथ 883 रन बनाए। 1981-82 में यशपाल शर्मा ने इंग्लैंड के खिलाफ 140 रन बनाते हुए जीआर विश्वनाथ के साथ 316 रन की रिकॉर्ड साझेदारी की।
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इस दिग्गज क्रिकेटर ने अपने करियर में साबित किया है कि बड़े मंच पर दबाव के बावजूद आत्मविश्वास और मेहनत से सफलता हासिल की जा सकती है। वर्ल्ड कप 1983 में उनका जुझारू प्रदर्शन टीम के लिए समर्पण और मुश्किल परिस्थितियों में बेहतर करने का जज्बा किसी भी खिलाड़ी को खास बनाता है।