भारतीय निशानेबाजी जगत के लिए 28 जून काफी रोमांचक अनुभव लेकर आता रहा है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। इसकी वजह उस रोमांच के केंद्र का असमय दुनिया से चले जाना है, जिसने भारतीय निशानेबाजी को एक एथलीट और कोच के तौर पर न सिर्फ समृद्ध किया, बल्कि पूरी दुनिया में प्रतिष्ठा दिलायी। हम बात कर रहे हैं महान भारतीय निशानेबाज और कोच जसपाल राणा की।

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जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में हुआ था। इस बार उनका 50वां जन्मदिवस है, मगर अफसोस यह है कि राणा अपना 50वां जन्मदिन मनाने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं। इस अवसर के 16 दिन पहले (12 जून 2026) को उनका दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया। राणा का इतनी कम उम्र में दुनिया को अलविदा कहना न सिर्फ उनके परिवार के लिए कभी न पूरी होने वाली क्षति है, बल्कि भारतीय निशानेबाजी जगत के लिए बहुत बड़ा शून्य है। राणा के निधन से भारतीय निशानेबाजी जगत ने वो कोच खो दिया है जिसके दम पर देश ओलंपिक में स्वर्ण जीतने का सपना देख रहा था।

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जाने वाले कभी नहीं लौटते, लेकिन जिंदगी के दौरान उनके द्वारा किया गया कार्य ही उन्हें उनके बाद जिंदा रखता है। राणा की जिंदगी एक निशानेबाज और फिर इसी स्पर्धा में कोच के तौर पर असाधारण रही है। वह अपनी हासिल की गई उपलब्धियों के आधार पर भारतीय निशानेबाजी के अमिट और असाधारण हस्ताक्षर बन चुके हैं।

जसपाल राणा के करियर पर नजर डालें, तो उन्होंने महज 12 साल की उम्र में 1988 में 31वीं राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता में रजत पदक जीता था। 1994 में इटली के मिलान में आयोजित विश्व निशानेबाजी प्रतियोगिता में जूनियर स्तर पर उन्होंने विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए अंतर्राष्ट्रीय पहचान हासिल की थी। 1996 में अटलांटा ओलंपिक में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया।

राणा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में 15 पदक जीते, जिसमें 1994 और 2006 के बीच चार संस्करणों में नौ स्वर्ण पदक शामिल थे। उन्होंने आठ एशियन गेम्स पदक भी जीते, जिसमें से चार स्वर्ण पदक थे। उनकी सबसे यादगार उपलब्धियों में 2006 के दोहा एशियन गेम्स शामिल हैं, जहां उन्होंने तेज बुखार के बावजूद तीन स्वर्ण पदक जीते और 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल इवेंट में 590 के विश्व रिकॉर्ड स्कोर की बराबरी की।

एथलीट के तौर पर संन्यास के बाद राणा कोचिंग के क्षेत्र में सक्रिय हुए और देश के लिए भविष्य के निशानेबाजों को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी मेहनत का परिणाम हमें पेरिस ओलंपिक 2024 में दिखा था। उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेने वाली मनु भाकर ने 2 पदक जीते। वह एक ओलंपिक में 2 पदक (कांस्य) जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बनीं।

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राणा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में 15 पदक जीते, जिसमें 1994 और 2006 के बीच चार संस्करणों में नौ स्वर्ण पदक शामिल थे। उन्होंने आठ एशियन गेम्स पदक भी जीते, जिसमें से चार स्वर्ण पदक थे। उनकी सबसे यादगार उपलब्धियों में 2006 के दोहा एशियन गेम्स शामिल हैं, जहां उन्होंने तेज बुखार के बावजूद तीन स्वर्ण पदक जीते और 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल इवेंट में 590 के विश्व रिकॉर्ड स्कोर की बराबरी की।

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यह पहला मौका है, जब जसपाल राणा अपने जन्मदिवस पर सशरीर उपस्थित नहीं हैं, लेकिन अपनी उपलब्धियों की बदौलत वह भारतीय खेलों की दुनिया में हमेशा अमर रहेंगे।

Article Source: IANS

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