भारतीय फुटबॉल के इतिहास में सत्यजीत घोष का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। सत्यजीत की पहचान एक मजबूत डिफेंडर के रूप में थी। वह भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान भी रहे थे।
सत्यजीत घोष का जन्म पश्चिम बंगाल के बांदेल में हुआ था। उनकी जन्मतिथि के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। सत्यजीत बचपन से ही फुटबॉल में रुचि रखते थे और इस खेल में कुछ बड़ा करने का लक्ष्य लिए कड़ी मेहनत करते थे। सत्यजीत एक बेहतरीन डिफेंडर थे। उनकी टाइमिंग और पोजिशनिंग शानदार थी। उनके सामने से गेंद को ले जाना विपक्षी टीम के लिए मुश्किल चुनौती हुआ करती थी। वे न केवल विपक्षी हमलों को नाकाम करते, बल्कि मिडफील्ड को गेंद पहुंचाकर आक्रमण की शुरुआत भी करते। सुब्रत भट्टाचार्य के साथ उनकी डिफेंस की जोड़ी काफी लोकप्रिय रही।
भारतीय टीम के लिए सत्यजीत घोष का योगदान बेहद सराहनीय रहा। 1985 में कोच्चि में आयोजित नेहरू कप में उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की थी। यह टूर्नामेंट उस समय एशिया का प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय आयोजन था। इस टूर्नामेंट में सत्यजीत के शानदार खेल ने भारतीय टीम को मजबूती प्रदान की थी। भारत को उस टूर्नामेंट में सफलता नहीं मिली थी।
सत्यजीत घोष का जन्म पश्चिम बंगाल के बांदेल में हुआ था। उनकी जन्मतिथि के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। सत्यजीत बचपन से ही फुटबॉल में रुचि रखते थे और इस खेल में कुछ बड़ा करने का लक्ष्य लिए कड़ी मेहनत करते थे। सत्यजीत एक बेहतरीन डिफेंडर थे। उनकी टाइमिंग और पोजिशनिंग शानदार थी। उनके सामने से गेंद को ले जाना विपक्षी टीम के लिए मुश्किल चुनौती हुआ करती थी। वे न केवल विपक्षी हमलों को नाकाम करते, बल्कि मिडफील्ड को गेंद पहुंचाकर आक्रमण की शुरुआत भी करते। सुब्रत भट्टाचार्य के साथ उनकी डिफेंस की जोड़ी काफी लोकप्रिय रही।
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सत्यजीत घोष फुटबॉल से संन्यास के बाद अपने गांव लौट गए थे। वे युवाओं को फुटबॉल की कोचिंग दिया करते थे। 9 नवंबर 2020 को उनका निधन 62 साल की उम्र में हार्ट अटैक से हो गया था।