तृप्ति मुर्गंडे की गिनती भारत की बेहतरीन बैडमिंटन खिलाड़ियों में की जाती है। उन्होंने उस दौर में इस खेल में उल्लेखनीय सफलताएं हासिल कीं, जब खिलाड़ियों को आज जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। तीन बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप के फाइनल में हार का सामना करने के बावजूद तृप्ति ने हिम्मत नहीं हारी और चौथे प्रयास में राष्ट्रीय चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। इसके अलावा, उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों की टीम स्पर्धा में भारत को कांस्य पदक दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई।
तृप्ति मुर्गंडे का जन्म 3 जून 1982 को पुणे में हुआ था। उन्हें बचपन से ही बैडमिंटन में गहरी रुचि थी। महज नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने पुणे स्थित एक अकादमी में दाखिला लिया और वसंत गोरे के मार्गदर्शन में खेल की बारीकियां सीखीं।
बैडमिंटन के प्रति उनके जुनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कम उम्र में ही वह अपने खेल को निखारने के लिए बेंगलुरु पहुंच गईं। वहां उन्होंने प्रकाश पादुकोण की अकादमी में प्रशिक्षण लिया। कड़ी मेहनत और लगातार अभ्यास का नतीजा यह रहा कि वह जल्द ही जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय चैंपियन बन गईं।