मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (एमसीसी) ने स्पष्ट किया है कि ढाका में बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच दूसरे वनडे मैच के दौरान सलमान अली आगा का विवादास्पद रन-आउट क्रिकेट नियमों के तहत सही था। एमसीसी ने यह भी कहा कि फील्डिंग करने वाली टीम 'क्रिकेट की भावना' का ध्यान रखते हुए अपनी अपील वापस लेने का विकल्प चुन सकती थी।
उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश के ऑलराउंडर मेहदी हसन मिराज ने मोहम्मद रिजवान के खेले एक शॉट को फील्ड करने की कोशिश की। जब मिराज गेंद को पकड़ने के लिए पिच पर आगे बढ़े, तो उनकी टक्कर आगा से हो गई, जो नॉन-स्ट्राइकर छोर पर पीछे हट गए थे। इसके बाद आगा गेंद को उठाकर उसे गेंदबाज को वापस देने के लिए नीचे झुके। हालांकि, मिराज ने तेजी से गेंद पकड़ी और उसे स्टंप्स पर थ्रो किया। आगा अभी भी अपनी क्रीज से बाहर थे, जिसके चलते उन्हें आउट करार दिया गया। मैच के बाद, आगा ने 'क्रिकेट की भावना' का जिक्र करते हुए कहा कि अगर वह फील्डर होते, तो कुछ और ही करते और 'खेल भावना' का परिचय देते।
इस घटना के बाद काफी बहस छिड़ी, जिसके जवाब में एमसीसी ने एक बयान जारी करते हुए पुष्टि की है कि मैदान पर लिया गया फैसला सही था। बयान में कहा गया, "नियमों के अनुसार, अंपायर कुछ और नहीं कर सकते थे। जब विकेट गिरा, तब नॉन-स्ट्राइकर स्पष्ट तौर पर अपनी क्रीज से बाहर थे, और गेंद खेल में थी। इसलिए, यह आउट था।"
एमसीसी ने यह भी बताया कि गेंद को हाथ लगाने की कोशिश करके आगा ने खुद को और भी ज्यादा जोखिम में डाल दिया था। बयान में आगे कहा गया, "यह बताना भी जरूरी है कि जब गेंद खेल में थी, तब नॉन-स्ट्राइकर अपनी क्रीज से बाहर निकल गए थे, और जब उनकी टक्कर मेहदी से हुई, तब वह बस अपनी क्रीज में वापस आने की कोशिश ही कर रहे थे। इसके अलावा, किसी भी बल्लेबाज को फील्डिंग टीम की अनुमति के बिना गेंद को हाथ लगाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगर वह ऐसा करते, तो उन पर 'फील्ड में बाधा डालने' के नियम के तहत आउट होने का जोखिम होता। पीछे मुड़कर देखें, तो उनके लिए यही बेहतर होता कि वह उस समय का इस्तेमाल अपनी क्रीज में वापस आने की कोशिश करने में करते।"
कुछ फैंस का मानना है कि इस विवाद के बाद गेंद को 'डेड' घोषित कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन एमसीसी ने इस व्याख्या को खारिज कर दिया। एमसीसी ने कहा कि नियमों के अनुसार, ऐसी स्थिति में इस तरह का फैसला लेने की अनुमति नहीं है।
बयान में आगे कहा गया, "कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि गेंद को 'डेड' माना जाना चाहिए था। नियमों के अनुसार, ऐसा करना संभव नहीं है। खिलाड़ियों की टक्कर होने पर गेंद 'डेड' नहीं हो जाती, अगर ऐसा होता, तो खिलाड़ी जान-बूझकर टक्कर लेने की कोशिश करते, खासकर तब जब स्थिति उनके पक्ष में होती। यहां किसी गंभीर चोट का कोई सवाल ही नहीं था, इसलिए इस आधार पर 'डेड बॉल' का फैसला नहीं दिया जा सकता था। अंपायर के लिए यह समझना मुश्किल था कि क्या सभी खिलाड़ियों ने गेंद को 'इन-प्ले' (खेल में) मानना बंद कर दिया था, क्योंकि मेहदी को साफतौर पर लग रहा था कि गेंद अभी भी 'लाइव' है, भले ही आगा को ऐसा न लगा हो। गेंद को बॉलर या विकेटकीपर के हाथों में 'पूरी तरह से स्थिर' भी नहीं माना जा सकता था, क्योंकि गेंद तो जमीन पर पड़ी थी।"
एमसीसी ने स्पष्ट किया है कि 'डेड-बॉल' का संशोधित नियम, जो अक्टूबर से लागू होने वाला है, इस घटना के परिणाम को नहीं बदल पाता।
बयान में आगे कहा गया, "कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि गेंद को 'डेड' माना जाना चाहिए था। नियमों के अनुसार, ऐसा करना संभव नहीं है। खिलाड़ियों की टक्कर होने पर गेंद 'डेड' नहीं हो जाती, अगर ऐसा होता, तो खिलाड़ी जान-बूझकर टक्कर लेने की कोशिश करते, खासकर तब जब स्थिति उनके पक्ष में होती। यहां किसी गंभीर चोट का कोई सवाल ही नहीं था, इसलिए इस आधार पर 'डेड बॉल' का फैसला नहीं दिया जा सकता था। अंपायर के लिए यह समझना मुश्किल था कि क्या सभी खिलाड़ियों ने गेंद को 'इन-प्ले' (खेल में) मानना बंद कर दिया था, क्योंकि मेहदी को साफतौर पर लग रहा था कि गेंद अभी भी 'लाइव' है, भले ही आगा को ऐसा न लगा हो। गेंद को बॉलर या विकेटकीपर के हाथों में 'पूरी तरह से स्थिर' भी नहीं माना जा सकता था, क्योंकि गेंद तो जमीन पर पड़ी थी।"
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बल्लेबाज को आउट दिए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए एमसीसी ने माना कि अगर बांग्लादेश की टीम 'क्रिकेट की भावना' का सम्मान करना चाहती, तो वे उस बल्लेबाज को वापस बुला सकते थे।