इन दिनों के पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बदलाव का एक क्रिकेट कनेक्शन है। भारत के पूर्व तेज गेंदबाज अशोक डिंडा (Ashok Dinda) ने 2021 की अपनी पहली जीत (1260 वोट से) के बाद, अपने जन्मस्थान मोयना (Moyna) से फिर से असेंबली चुनाव में जीत हासिल की (इस बार 16,241 वोट से)। भारत के लिए 13 वनडे और 9 टी20 इंटरनेशनल में क्रमशः 12 और 17 विकेट लिए। एक ख़ास बात और, जो टी20 इंटरनेशनल खेले उनमें से हर एक में कम से कम एक विकेट जरूर लिया। 2012 में कैंडी में श्रीलंका के विरुद्ध शानदार जीत में 19 रन पर 4 विकेट के साथ करियर का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया।

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अशोक डिंडा अभी भी अपने उन आलोचकों को नहीं भूले हैं, जिन्होंने 2019-20 रणजी ट्रॉफी शुरू होने से ठीक पहले बंगाल टीम से बिना किसी स्पष्टीकरण बाहर किए जाने पर उनका मजाक उड़ाया था। हाल ही में, अशोक डिंडा ने बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के विज़न प्रोजेक्ट में कोच के तौर पर भी काम किया लेकिन अब तो पश्चिम बंगाल के नए खेल मंत्री के नाते उनकी पूरे राज्य के खेलों के लिए जिम्मेदारी है।

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अशोक डिंडा 2021 में असेंबली चुनाव से पहले, अपना खेल करियर खत्म करने के बाद, राजनीति में आए थे। संयोग से, उसी दिन, भारत के एक और क्रिकेटर मनोज तिवारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) में शामिल हुए। मनोज जीते तो पश्चिम बंगाल के नए खेल मंत्री बने हालांकि तब भी एक एक्टिव क्रिकेटर थे। रणजी ट्रॉफी में बंगाल की कप्तानी भी की थी। अब अशोक डिंडा के पास वही पोर्टफोलियो है। इस तरह पश्चिम बंगाल को एक और क्रिकेटर खेल मंत्री मिल गया है। मनोज से पहले इस मिनिस्ट्री में लक्ष्मी रतन शुक्ला थे और वे भी भारतीय क्रिकेट में एक और जाना-पहचाना नाम हैं।

क्रिकेट की बात करें तो अशोक डिंडा को हमेशा एक ऐसे स्टार के तौर पर याद किया जाएगा जो टेस्ट कैप के हकदार थे। 2008 में केकेआर के साथ आईपीएल में एंट्री की और कुल 5 अलग-अलग फ्रेंचाइजी के लिए 78 आईपीएल मैच खेले, जिसमें 30+ के महंगे गेंदबाजी औसत और ऊंचे इकॉनमी रेट से 69 विकेट लिए। 2008 से 2010 के बीच केकेआर और 2011 में दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए खेलने के बाद, 2012 में पुणे वॉरियर्स इंडिया में गए और 2013 में उनके बंद होने तक उस फ्रेंचाइजी के साथ रहे। 2014 में, दो साल के लिए रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर में शामिल हुए और 2016 और 2017 में राइजिंग पुणे सुपरजायंट के साथ उनके आईपीएल के आख़िरी दो साल थे।

घरेलू रेड-बॉल क्रिकेट में सबसे कामयाब तेज गेंदबाजों में से एक रहे और सिर्फ 196 पारी में 420 विकेट लिए। पेसर में से, सिर्फ़ आर विनय कुमार, पंकज सिंह, बसंत मोहंती, मदन लाल और आशीष विंस्टन जैदी ने ही रणजी ट्रॉफी में डिंडा से ज्यादा विकेट लिए थे। उनके घरेलू प्रदर्शन ने 2009 और 2013 के बीच व्हाइट-बॉल इंटरनेशनल मैचों में तो एंट्री दिला दी लेकिन टेस्ट क्रिकेट में मौका नहीं मिला।

25 मार्च, 1984 को कोलकाता में जन्मे डिंडा का बॉलिंग एक्शन बड़ा दमदार और मुश्किल था। 2005 में फर्स्ट-क्लास डेब्यू किया था। दाएं हाथ के इस तेज़ गेंदबाज़ ने दिसंबर 2009 में श्रीलंका के विरुद्ध नागपुर में टी20 इंटरनेशनल में भारत के लिए डेब्यू किया था। 2019 तक फर्स्ट-क्लास क्रिकेट खेलना जारी रखा। 116 मैच खेले, जिसमें उनका आखिरी मैच 2021 में था। कुल 98 लिस्ट A मैच में 28.50 औसत से 151 विकेट लिए। 2020 में, अशोक डिंडा ने बंगाल छोड़कर गोवा ट्रांसफर लिया पर एक ही सीजन खेले और फरवरी 2021 में रिटायर हो गए।

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एक मजेदार बात ये कि हाल के सालों में राजनीति में आने वाले ज्यादातर क्रिकेटरों का कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) से कोई न कोई कनेक्शन है: गौतम गंभीर के साथ लक्ष्मी रतन शुक्ला, मनोज तिवारी, अशोक डिंडा और यूसुफ पठान भी हैं।

अशोक डिंडा से जुड़ी एक बड़ी मजेदार स्टोरी 2007 के बंगाल और मुंबई के बीच रणजी ट्रॉफी फाइनल में उनके सचिन तेंदुलकर से टकराव की है। घरेलू क्रिकेट में गेंदबाज़ कभी मास्टर ब्लास्टर की स्लेजिंग के बारे में सोचते भी नहीं थे लेकिन युवा अशोक डिंडा ने तेंदुलकर की कोहनी पर हिट करने के बाद उन्हें घूरा भी। तब के बंगाल के कप्तान दीप दासगुप्ता ने पहले ही सलाह दे दी थी कि 'सचिन के सामने सिर्फ बॉलिंग करो' लेकिन डिंडा बैटर को बीट करने के बाद अपने फॉलो-थ्रू में 2-3 एक्स्ट्रा कदम उठाने के बाद उसे घूरने की आदत से बाज नहीं आए। दीप ने फिर से कहा, 'सचिन से कुछ मत कहो' पर डिंडा ने अपने कप्तान की बात नहीं सुनी। कुछ गेंदें फेंकने के बाद सचिन को घूरा। सचिन ने आखिरकार सेंचुरी (105) बनाई। मुंबई ने मैच 132 रन से जीत लिया।

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अब अशोक डिंडा के सामने एक नई चुनौती है। वे कहते हैं, 'मैं स्पोर्ट्स बैकग्राउंड से हूं, पॉलिटिक्स से नहीं। भारत के लिए खेलना मेरे लिए गर्व की बात थी लेकिन पॉलिटिक्स का मतलब है लोगों की सेवा, उनके बीच रहना और उनकी मदद करना। ये एक आशीर्वाद है, भगवान का वरदान है। हर किसी को ऐसा मौका नहीं मिलता। बहुत से लोगों के पास पैसा होता है, लेकिन उन्हें सेवा करने का मौका नहीं मिलता। किसी को हॉस्पिटल में इलाज में मदद करना, उन परिवार की मदद करना जो दवा का खर्च नहीं उठा सकते, यह सच में बड़ा मायने रखता है।'

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लेखक के बारे में

Charanpal Singh Sobti
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