Indian Cricketers Train Tales: पिछले दिनों, 2026 टी20 वर्ल्ड कप में खेलने के बाद इंग्लैंड, वेस्टइंडीज और दक्षिण अफ्रीका जैसी टीमों के अपने देश वापस लौटने की ख़बर में हुई देरी पूरी दुनिया में चर्चा में रही। उन्हें असल में किसी शिकायत की जगह इस खबर को नोट करना चाहिए कि BCCI से तो अहमदाबाद में वर्ल्ड कप फ़ाइनल में भारत की जीत बाद, टीम के स्टार शिवम दुबे के मुंबई लौटने की भी फ्लाइट बुक नहीं हुई। खुद शिवम दुबे ने ये स्टेटमेंट दी और कोई ऐसी वजह नहीं कि कि उनकी टिकट न मिलने वाली स्टेटमेंट पर शक करें। शिवम ने कहा, 'किसी भी फ्लाइट में टिकट नहीं थी, इसलिए मैंने सुबह-सुबह ट्रेन से अहमदाबाद से मुंबई जाने का फ़ैसला किया। सड़क के रास्ते भी जा सकते थे, लेकिन ट्रेन से जल्दी पहुंचते।'
रिपोर्ट ये आई कि शिवम दुबे अपने पिता और बच्चों (चार साल के बेटे अयान और दो साल की बेटी महविश) से जल्दी से मिलने के लिए बेताब थे। इसलिए उन्होंने फ्लाइट के टिकट मिलने का इंतज़ार नहीं किया और ट्रेन पकड़ ली। साथ में उनकी पत्नी अंजुम और एक दोस्त और ट्रेन पकड़ी सुबह 5:10 बजे वाली (ये सोचकर कि तब प्लेटफ़ॉर्म पर ज़्यादा भीड़ नहीं होगी), अहमदाबाद-मुंबई सायाजी एक्सप्रेस (Ahmedabad-Mumbai Sayaji Express)। वैसे सोशल मीडिया पर तो ये सवाल भी उठा कि ऐसे बिजी रूट पर उन्हें आखिरी समय में AC 3-Tier कोच का कन्फ़र्म टिकट भी कैसे मिल गया?
शिवम दुबे को अंदाज़ा था कि ट्रेन से सफ़र में जोखिम है क्योंकि अगर किसी ने पहचान लिया तो आस-पास भीड़ जमा होने में देर नहीं लगेगी। स्टेशन पर या ट्रेन के अंदर कोई न पहचाने, इसलिए मास्क पहना और सर पर कैप। ट्रेन कोच में पहुंचते ही, ऊपर वाली बर्थ पर रेलवे के कंबल के नीचे खुद को छिपा सा लिया। टिकट चेक करते हुए TC ने अपने चार्ट से शिवम दुबे नाम पढ़ा तो फ़ौरन पूछा भी, 'वह कौन है? क्रिकेटर?'
अंजुम ने समझदारी से हालात को संभाला और साफ़ इनकार कर दिया कि वह 'क्रिकेटर शिवम दुबे' है। यहां तक कि साथ सफ़र करने वालों को भी ज़रा भनक न लगी कि उनके बीच वर्ल्ड चैंपियन टीम का एक स्टार क्रिकेटर मौजूद है। वह खुशकिस्मत रहे कि उनके ट्रेन सफ़र की ख़बर लीक नहीं हुई और किसी भी स्टेशन पर कोई यह चिल्लाते हुए कोच में नहीं घुसा, 'शिवम दुबे किधर है, शिवम दुबे किधर है!'
ये स्टोरी हमें क्रिकेट की एक और दिलचस्प स्टोरी की ओर ले जाती है, जहां एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि पूरी क्रिकेट टीम ने ट्रेन के सफ़र के दौरान अपनी पहचान छिपाने की कोशिश की थी। देखिए क्या हुआ तब:
ये तब की बात है जब BCCI (और साथ की ज़्यादातर स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के पास भी) कोई ख़ास पैसा नहीं था और BCCI के घरेलू टूर्नामेंट के लिए टीमें अक्सर ट्रेन से सफ़र करती थीं (तब कोई लग्ज़री ट्रेन भी नहीं थीं), और वह भी कभी-कभी बिना रिज़र्वेशन। 1979-80 सीज़न में, मुंबई की टीम रणजी ट्रॉफ़ी के क्वार्टर फ़ाइनल में बिहार से खेलने के लिए ट्रेन से जमशेदपुर जा रही थी। आधी रात को, लगभग 3 बजे, एक स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही भीड़ कोच में घुस आई। आए लोग इतनी जल्दी में थे कि सो रहे पेसेंजर के ऊपर से कंबल हटाने लगे और साथ में चिल्ला रहे थे, 'किधर है, किधर है!' उन्हें खबर मिली थी कि कुछ क्रिकेटर ट्रेन से सफर कर रहे हैं और वे उन्हें ढूंढ रहे थे।
दिलीप वेंगसरकर (जो ऊपर वाली बर्थ पर सो रहे थे) की भी नींद खराब हुई और जबरदस्ती कंबल हटाए जाने से उन्हें गुस्सा आ गया। वे तो उलझ गए और आपस में बहस शुरू हो गई। इस से माहौल बिगड़ गया और अब गुस्से में आई भीड़ ने जिद्द पकड़ ली कि वंसारकर माफ़ी मांगें। भीड़ से आवाजें आईं कि जब तक दिलीप माफ़ी नहीं मांगते, ट्रेन आगे नहीं बढ़ेगी।
कप्तान सुनील गावस्कर ने भांप लिया था कि बात बिगड़ रही है। उन्होंने भीड़ से बड़े प्यार से कहा कि ट्रेन से बाहर आ जाएं और वहां बात कर लेते हैं। भीड़ में जो लीडर बने हुए थे, वे मान गए। विश्वास कीजिए सुनील गावस्कर अकेले ही प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ के साथ बैठे थे और उनसे बड़े दोस्ताना अंदाज़ में बातें कर रहे थे। गावस्कर की ये ट्रिक काम कर गई, और भीड़ इस बात से ही बड़ी खुश हो गई कि उन्हें सुनील गावस्कर से दोस्ताना बात करने का मौक़ा मिला। गुस्सा ठंडा हो गया और तब गार्ड साहेब को इशारा किया कि अब ट्रेन ले जाएं।
इसी ट्रेन सफर से जुड़ी एक और स्टोरी भी बड़ी दिलचस्प है। मुंबई की जो टीम इस जमशेदपुर मैच के लिए चुनी थी उसमें रवि शास्त्री नाम के एक नए युवा खिलाड़ी भी थे। मुंबई टीम के ज़्यादातर नियमित खिलाड़ियों ने तो इससे पहले रवि शास्त्री को देखा भी नहीं था। बाक़ी सभी खिलाड़ियों की तरह, उन्हें भी प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा होने के लिए कहा गया था। तय समय निकल गया पर रवि शास्त्री का कहीं अता-पता नहीं था। तब मोबाइल तो होते नहीं थे। गावस्कर को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें, रवि शास्त्री से संपर्क कैसे करें या उन्हें ढूंढें कैसे? आखिर में रवि शास्त्री के बिना ही ट्रेन चल पड़ी।
जब खिलाड़ी अपनी-अपनी बर्थ पर जा रहे थे, तो नोट किया कि किसी ने रवि शास्त्री के लिए बुक बर्थ पर कब्ज़ा कर लिया है और बड़े आराम से वहां सो रहे हैं। ये व्यक्ति कोई और नहीं, खुद रवि शास्त्री ही थे। असल में हुआ ये कि वह तय समय से पहले ही स्टेशन पहुंच गए थे। अपने सीनियर खिलाड़ियों को ढूंढने/उनके इंतजार में समय लगाए बिना, रवि शास्त्री सीधे अपनी बर्थ पर जाकर सो गए। सीनियर खिलाड़ियों ने उन्हें जगाया और एक-एक कर सब खुद रवि शास्त्री से मिले।
बिना रिजर्वेशन वाले कोच या गिनती में कम रिजर्वेशन बर्थ के बावजूद क्रिकेटरों के ट्रेन में सफर की कई स्टोरी हैं, लेकिन जो बिशन सिंह बेदी के साथ हुआ वह तो सबसे अलग रहा। तब बेदी भारत के टॉप स्पिनर थे और नागपुर में मैच खेलने के बाद चंडीगढ़ में दलीप ट्रॉफी का मैच खेलना था। इन दोनों मैचों के बीच सिर्फ एक दिन था और उसी में नागपुर से चंडीगढ़ पहुंचना था।
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जिस दिन वापस लौटना था, बेदी को पता चला कि दिल्ली वापस लौटने और आगे चंडीगढ़ जाने के लिए, उनके पास ट्रेन रिजर्वेशन नहीं है। समय कम था और बेदी भागते-भागते चलती ट्रेन में चढ़े। हाथ में थोड़ा ही सामान था और तभी भागते हुए, चलती ट्रेन में चढ़ पाए थे। पूरी रात सामान रखने वाली रैक पर बिताई। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से वे कश्मीरी गेट स्थित ISBT गए और वहां से चंडीगढ़ के लिए बस पकड़ी। इस किस्से से ये भी पता चलता है कि खिलाड़ी तब, घरेलू क्रिकेट के मैच खेलने को कितना भाव देते थे।