'मन के जीते जीत है, मन के हारे हार, हार गए जो बिन लड़े, उन पर है धिक्कार।' जिंदगी में कुछ हादसे ऐसे होते हैं, जो आपकी जिंदगी को बदलकर रख देते हैं। हालांकि, जो हर परिस्थिति को स्वीकार करके बहादुरी से लड़ाई लड़ता है, उसका साथ किस्मत भी देती है। सड़क हादसे में अपना एक पैर गंवाने वालीं मानसी जोशी भी उन बहादुर खिलाड़ियों में से एक हैं, जो हालात के आगे झुकी नहीं, बल्कि उससे लड़कर अपनी विश्व स्तर पर पहचान बनाई।
भारत की पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी मानसी का जन्म 11 जून, 1989 को गुजरात के राजकोट में हुआ। बैडमिंटन के खेल में उनकी शुरुआत से ही खास दिलचस्पी थी। बचपन में मानसी के पिता ने उन्हें इस खेल के बारे में जानकारी दी और वह खाली समय में बेटी के साथ बैडमिंटन में हाथ आजमाया करते थे। इससे मानसी का इस खेल के प्रति लगाव बढ़ता गया। इस दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और वह इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग पूरी करके बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर नौकरी करने लगीं।
नौकरी के साथ-साथ मानसी बैडमिंटन पर भी पूरा ध्यान देती थीं। हालांकि, 22 साल की उम्र में एक ऐसा हादसा हुआ, जिसने उनकी पूरी जिंदगी को पलटकर रख दिया। मानसी दो पहिया वाहन से दफ्तर जा रही थीं और इस दौरान एक बेकाबू ट्रक से उनकी टक्कर हो गई। ट्रक उनके बाएं पैर को रौंदता हुआ निकल गया। अस्पताल में चले इलाज के बाद मानसी का एक पैर काटना पड़ा और अवसाद ने भी उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया।
इसके बाद अपने एक दोस्त के कहने पर मानसी ने फिर से हिम्मत जुटाई और बैडमिंटन खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे मानसी इस खेल में रमती चली गईं और एक के बाद एक सफलता उनके कदम चूमने लगी। मानसी ने इसके बाद हैदराबाद जाने का फैसला किया और पुलेला गोपीचंद की अकादमी में दाखिला ले लिया। घरेलू स्तर पर अपना दमखम दिखा रही मानसी ने कड़ी मेहनत के दम पर खुद को इंटरनेशनल स्टेज के लिए भी तैयार कर लिया।
नौकरी के साथ-साथ मानसी बैडमिंटन पर भी पूरा ध्यान देती थीं। हालांकि, 22 साल की उम्र में एक ऐसा हादसा हुआ, जिसने उनकी पूरी जिंदगी को पलटकर रख दिया। मानसी दो पहिया वाहन से दफ्तर जा रही थीं और इस दौरान एक बेकाबू ट्रक से उनकी टक्कर हो गई। ट्रक उनके बाएं पैर को रौंदता हुआ निकल गया। अस्पताल में चले इलाज के बाद मानसी का एक पैर काटना पड़ा और अवसाद ने भी उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया।
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मानसी ने अपने इस सफर में कभी भी अपनी शारीरिक अक्षमता को आड़े नहीं आने दिया। साल 2022 में उन्हें 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।