जमाने से विपरीत चलना हमेशा मुश्किल होता है। आप अकेले होते हैं और संघर्ष के साथ सफलता की राह भी आपको खुद ढूंढनी होती है। चेतेश्वर पुजारा की कहानी कुछ ऐसी ही है।
फटाफट क्रिकेट के दौर में अपनी धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी से पुजारा ने न सिर्फ टेस्ट क्रिकेट में बड़ी सफलता हासिल की बल्कि एक दशक तक इस फॉर्मेट में भारत की सबसे मजबूत कड़ी रहे। पुजारा को उनकी मजबूत मनोदशा और क्रीज पर लंबा समय गुजारने की क्षमता की वजह से राहुल द्रविड़ के बाद दूसरा 'द वॉल' कहा गया।
25 जनवरी 1988 को गुजरात के राजकोट में जन्मे चेतेश्वर पुजारा को क्रिकेटर बनाने में सबसे बड़ा योगदान उनके पिता अरविंद पुजारा का है। अरविंद खुद भी एक प्रथम श्रेणी क्रिकेटर और कोच रहे। देश के लिए खेलने की उनकी इच्छा कभी पूरी नहीं हुई, लेकिन अपने बेटे के माध्यम से उनकी आंखों ने इस सपने को पूरा होते देखा।