उत्तर-पूर्वी केन्या के गरिसा काउंटी स्थित दादाब रिफ्यूजी कॉम्प्लेक्स में हर बार जब जने इस्साक अधन अपनी सीटी बजाकर फुटबॉल प्रशिक्षण शुरू करती हैं, तो यह केवल एक अभ्यास सत्र की शुरुआत नहीं होती, बल्कि सैकड़ों युवा शरणार्थियों के बेहतर भविष्य की उम्मीद भी जाग उठती है। 41 वर्षीय अधन, जो स्वयं एक सोमाली शरणार्थी और 12 बच्चों की मां हैं, खेल को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाकर युवाओं को अपराध, नशे और निराशा से दूर रखने का अभियान चला रही हैं।
अधन दादाब कॉम्प्लेक्स के डगाहाले रिफ्यूजी कैंप में रहती हैं। पांच वर्ष पहले उन्होंने महसूस किया कि कैंप में रहने वाले युवाओं के पास कोई सकारात्मक दिशा नहीं है। बेरोजगारी, सीमित अवसर और भविष्य को लेकर अनिश्चितता के कारण कई युवा नशे की लत में फंस रहे थे, आपराधिक गिरोहों का हिस्सा बन रहे थे या बेहतर जीवन की तलाश में यूरोप पहुंचने की कोशिश में अपनी जान गंवा रहे थे। इसी स्थिति ने उन्हें फुटबॉल कोच बनने के लिए प्रेरित किया।
हालांकि उनका यह फैसला आसान नहीं था। रूढ़िवादी सामाजिक सोच वाले समुदाय के कुछ लोगों ने महिलाओं के फुटबॉल से जुड़ने पर आपत्ति जताई। अधन को लगातार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने उनके परिवार, उनकी बुजुर्ग मां और पति तक से संपर्क कर उन्हें कोचिंग छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की। उनका मानना था कि फुटबॉल महिलाओं के लिए उपयुक्त खेल नहीं है।