जीवन में लक्ष्य स्पष्ट हो और कड़ी मेहनत करने का जज्बा हो, तो बड़ी से बड़ी बाधाएं भी सफलता को नहीं रोक पाती हैं। टोक्यो और पेरिस पैरालंपिक में देश को सिल्वर दिलाने वाले निषाद कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

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निषाद कुमार का जन्म हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के बदायूं गांव में 3 अक्टूबर, 1999 को हुआ था। उनका परिवार खेती से जुड़ा है। 8 साल की उम्र में उनका बायां हाथ चारा काटने वाली मशीन में फंस गया। इस वजह से उस हाथ को काटना पड़ा। इतना बड़ा हादसा किसी भी इंसान के जीवन जीने की या कुछ करने की इच्छा को तोड़ सकता है, लेकिन निषाद कुमार उन लोगों में नहीं थे। निषाद ने ऊंची कूद में लंबी दूरी तय करने का निश्चय किया और उसके लिए कठोर मेहनत शुरू की।

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निषाद को उनके माता-पिता का हमेशा समर्थन मिला। उन्होंने कभी निषाद को दिव्यांग महसूस नहीं होने दिया। उनके इसी समर्थन की वजह से निषाद के संकल्प और हौसले में चट्टानी ताकत आई। वह स्कूल और कॉलेज में सामान्य कैटेगरी के खिलाड़ियों के साथ खेलते थे।

निषाद कुमार का जन्म हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के बदायूं गांव में 3 अक्टूबर, 1999 को हुआ था। उनका परिवार खेती से जुड़ा है। 8 साल की उम्र में उनका बायां हाथ चारा काटने वाली मशीन में फंस गया। इस वजह से उस हाथ को काटना पड़ा। इतना बड़ा हादसा किसी भी इंसान के जीवन जीने की या कुछ करने की इच्छा को तोड़ सकता है, लेकिन निषाद कुमार उन लोगों में नहीं थे। निषाद ने ऊंची कूद में लंबी दूरी तय करने का निश्चय किया और उसके लिए कठोर मेहनत शुरू की।

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लगातार दो पैरालंपिक में सिल्वर जीतकर निषाद ने इस बात को साबित किया है कि स्पष्ट लक्ष्य के पीछे हौसला, लगन और कड़ी मेहनत हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार निषाद की प्रशंसा कर चुके हैं।

Article Source: IANS

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