डाइविंग एक ऐसी जलक्रीड़ा है जिसमें खिलाड़ी ऊंचे 'प्लेटफॉर्म' या 'स्प्रिंगबोर्ड' से पानी में कलात्मक छलांग लगाते हैं। इस खेल में संतुलन, फ्लेक्सिबिलिटी, टाइमिंग और तकनीक अहम होती है।

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डाइविंग का खेल 18-19वीं सदी के करीब स्वीडन और जर्मनी में बेहद लोकप्रिय था। इस खेल की शुरुआत उन जिमनास्ट ने की, जो पानी में टंबलिंग का अभ्यास करते थे।

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जिमनास्ट अपने जिम्नास्टिक मूव्स का अभ्यास करने के लिए ऊंचे प्लेटफॉर्म से कूदते थे। इसे 'फैंसी डाइविंग' कहा जाता था। 1895 में इंग्लैंड में डाइविंग की पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें 15 या 30 फीट की ऊंचाई से कूदना होता था।

19वीं सदी के अंत में स्वीडिश डाइवर्स के एक ग्रुप ने ब्रिटेन का दौरा किया, जिन्होंने वहां इस खेल को लोकप्रिय बनाया।

साल 1901 में पहले डाइविंग संगठन, एमेच्योर डाइविंग एसोसिएशन का गठन हुआ। करीब 3 साल बाद ही इस खेल को ओलंपिक में भी शामिल कर लिया गया।

1904 सेंट लुइस ओलंपिक में डाइविंग को शामिल किया गया। 1908 लंदन ओलंपिक में इसमें स्प्रिंगबोर्ड और प्लेटफॉर्म इवेंट को जोड़ा गया। 1912 स्टॉकहोम ओलंपिक में इस खेल में महिला डाइवर्स को भी मौका दिया गया।

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समय के साथ, तकनीक, नियम और उपकरणों में बदलाव हुआ। 1960 के आसपास उन्नत डाइविंग बोर्ड को शामिल किया गया, जिसने इस खेल को और भी शानदार बनाया।

ओलंपिक में दो तरह के डाइविंग बोर्ड होते हैं: एक 'स्प्रिंगबोर्ड' और दूसरा 'प्लेटफॉर्म'। 'स्प्रिंगबोर्ड डाइविंग' पानी से 3 मीटर ऊपर एक लचीले बोर्ड से होती है। वहीं, 'प्लेटफॉर्म डाइविंग' पानी से 10 मीटर ऊपर होती है। इस बोर्ड में लचीलापन नहीं होता। इसके लिए डाइवर्स को अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करना होता है।

ओलंपिक में इन दोनों प्रकार की डाइविंग में 'व्यक्तिगत' और 'सिंक्रोनाइज्ड' इवेंट शामिल होते हैं। पुरुषों की प्रतियोगिता 6 राउंड की होती है, जबकि महिलाओं की प्रतियोगिता 5 राउंड की रहती है।

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व्यक्तिगत गोताखोरों को 7 जज अंक देते हैं। वहीं, सिंक्रोनाइज्ड डाइविंग में 11 जज का पैनल होता है। इस दौरान जज शुरुआती स्थिति, टेक ऑफ, फ्लाइट और पानी में प्रवेश के आधार पर अंक देते हैं।

ओलंपिक में इन दोनों प्रकार की डाइविंग में 'व्यक्तिगत' और 'सिंक्रोनाइज्ड' इवेंट शामिल होते हैं। पुरुषों की प्रतियोगिता 6 राउंड की होती है, जबकि महिलाओं की प्रतियोगिता 5 राउंड की रहती है।

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भारत धीरे-धीरे इस खेल में अपनी पहचान बना रहा है। ओलंपिक पदक जीतने के लिए दीर्घकालिक लक्ष्य रखते हुए कम उम्र के प्रतिभाशाली डाइवर्स को चुनकर उन्हें प्रशिक्षित करना होगा। इसके साथ ही उन्हें आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ विश्व स्तरीय कोचिंग भी देनी होगी। भारतीय खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर की जरूरत है।

Article Source: IANS
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