CD Gopinath: भारत के भूतपूर्व टेस्ट क्रिकेटर सीडी गोपीनाथ के 96 साल की उम्र में निधन से एक शानदार दौर का अंत हुआ। वह 1952 में, भारत की पहली ऐतिहासिक टेस्ट जीत हासिल करने वाली टीम के आखिरी जीवित सदस्य थे।
एक ऐसे क्रिकेटर थे गोपीनाथ जिनका वास्तव में क्रिकेटर बनने का कभी कोई इरादा नहीं था और इसीलिए ही तो 17 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया। वह कहते थे, 'जब मैं लोगों को बताता हूँ कि मैंने इतनी देर से क्रिकेट खेलना शुरू किया, तो कोई यकीन नहीं करता। मैंने इससे पहले हॉकी, फुटबॉल और टेनिस खेला था, क्रिकेट कभी नहीं।'
बड़ौदा के दत्ताजीराव गायकवाड़ के निधन (13 फरवरी 2024) के बाद से गोपीनाथ, भारत के सबसे बड़ी उम्र के जीवित टेस्ट क्रिकेटर थे। पूरा नाम चिंगलेपुट दोरैकन्नू गोपीनाथ, एक शानदार दाएं हाथ के बल्लेबाज़, जो 1951-52 से 1959-60 के बीच 8 टेस्ट खेले। इनमें साधारण सा प्रदर्शन (12 पारी में 22 की औसत से 242 रन, जिसमें एक 50), लेकिन 50 के दशक में रणजी ट्रॉफ़ी में मद्रास के लिए कहीं बेहतर बल्लेबाज़ रहे (51+ की औसत से 2349 रन, जिसमें छह 100 और 234 टॉप स्कोर) हालांकि 1949-50 में मैसूर के विरुद्ध अपने पहले रणजी ट्रॉफ़ी मैच में दोनों पारी में 0 पर आउट हो गए थे।
एक साल बाद, कानपुर में कॉमनवेल्थ XI के विरुद्ध पांचवें अनऑफिशियल टेस्ट में जब भारत के लिए डेब्यू किया तो भले ही उनकी टीम हार गई पर 66* बनाए। दिसंबर 1951 में, टेस्ट टीम में आ गए और मुंबई में इंग्लैंड के विरुद्ध टेस्ट डेब्यू किया और क्या शानदार शुरुआत की: पहली पारी में 50* और दूसरी पारी में भारत को 77-6 के संकट से निकाला तथा एसडब्ल्यू सोहोनी के साथ 8वें विकेट के लिए 71 रन की पार्टनरशिप की। गोपीनाथ ने 42 रन बनाए जो उस पारी का टॉप स्कोर था और इस कोशिश से भारत ने टेस्ट बचा लिया।
इस सीरीज का आखिरी टेस्ट मद्रास में था। वहां गोपीनाथ ने 35 रन बनाए, पॉली उमरीगर के साथ 7वें विकेट के लिए 93 रन जोड़े और आखिरकार भारत ने एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की। गोपीनाथ ने ही वीनू मांकड़ की गेंद पर ब्रायन स्टैथम का वह कैच लपका था जिस से भारत ने टेस्ट जीता। सबसे ख़ास बात ये थी कि अपनी ज़िंदगी के आखिरी पलों तक उन्हें उस यादगार टेस्ट जीत के खास पल याद थे। इसी तरह, जब 1954-55 में मद्रास ने पहली बार रणजी ट्रॉफी जीती थी, तब भी वह टीम में थे।
याद करते हुए कहते थे, '1952 में, जब हमने मद्रास में वह टेस्ट जीता तो ये हमारे लिए भी एक बहुत बड़ा सरप्राइज़ था। इसलिए, वह जीत और भी ज़्यादा रोमांचक और यादगार बन गई। तब शायद पहली बार किसी भारतीय टीम को ये यकीन हुआ था कि अपने से ज़्यादा मजबूत कही जाने वाली टीम को भी हरा सकते हैं। इसने तो एक नए नजरिए से क्रिकेट खेलने का जोश पैदा किया।'
भारत के मिडिल आर्डर में कई स्टार मौजूद होने से उन्हें खेलने के बहुत कम मौके मिले। अपना आखिरी टेस्ट 1959-60 में कलकत्ता में ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेला तो वहां पहली पारी में 39 रन बनाकर टॉप स्कोरर थे लेकिन दूसरी पारी में 0 पर आउट हो गए।
क्रिकेट से रिटायर होने के बाद भी वह क्रिकेट से जुड़े रहे। 1968-69 से 1976-77 तक लगातार 9 बार भारत की सिलेक्शन कमेटी में थे और इनमें से आखिरी पांच बार तो इसके चेयरमैन के तौर पर काम किया। 1979 में इंग्लैंड टूर पर गई टीम के मैनेजर भी वही थे। अपने समय के मशहूर क्रिकेटर वी रामायण के साथ मिलकर अपनी ऑटोबायोग्राफी, 'बियॉन्ड क्रिकेट: ए लाइफ इन मेनी वर्ल्ड्स (Beyond Cricket, A Life in Many Worlds)' लिखी।
1930 में उनका जन्म हुआ और उससे जुड़ी एक स्टोरी बड़ी अजीब और मजेदार तो है ही, इसके बारे में मालूम भी नहीं है। जिस दिन मद्रास (अब चेन्नई) में उनका जन्म हुआ, शहर में ब्रिटिश पुलिस ने, ब्रिटिश राज के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों के एक जुलूस पर गोलियां चला दीं जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। इस से शहर में दंगे जैसे हालात पैदा हो गए, कर्फ्यू लग गया और कर्फ्यू तोड़ने वालों को 'देखते ही गोली मारने' का आर्डर था। इन हालात में डॉक्टर ने नए जन्मे बच्चे का नाम 'बेबी गन (Baby Gun)' लिख दिया। संयोग देखिए अपनी ज़िंदगी के आख़िरी सालों में गोपीनाथ की बंदूक और निशानेबाज़ी में बड़ी रूचि रही और इस से जुड़े रहे।
एक और मजेदार फैक्ट: जो कैच उन्होंने लपका और वह ऐतिहासिक टेस्ट जीत भारत ने हासिल कर की पर वह गेंद कहां है? गोपीनाथ ने इस गेंद को एक सोविनियर के तौर पर अपने पास रख लिया, इस पर टीम के सभी खिलाड़ियों के ऑटोग्राफ लिए, और आज भी ये गेंद कॉनूर में उनके घर में है। हां 70 साल से भी ज़्यादा बीत जाने के बाद, इस पर से सभी ऑटोग्राफ लगभग मिट चुके हैं।
वह उन गिने-चुने लोगों में से एक थे, जो वेस्टइंडीज के महान क्रिकेटर फ्रैंक वॉरेल से उनकी मृत्यु से ठीक पहले मिले थे। वॉरेल 1967 में मद्रास आए तो गोपीनाथ ने उन्हें अपने घर डिनर पर बुलाया। वहां वॉरेल ने जिक्र किया कि पिछले एक हफ़्ते या दस दिन से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था, काफ़ी बेचैन और उदास महसूस कर रहे थे। गोपीनाथ ने उन्हें डॉक्टर से सलाह लेने की हिदायत दी थी। इसके एक हफ़्ते के अंदर ही, वॉरेल का ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) से निधन हो गया, जिसकी जानकारी न होने से उनका इलाज नहीं हो पाया।
भारतीय क्रिकेट का 1952 का एक बड़ा मशहूर किस्सा है। जो टीम इंग्लैंड टूर पर गई उसके सिर्फ एक खिलाड़ी को हिंदी नहीं आती थी। इसे भी हर रोज हिंदी सीखने की सलाह मिली ताकि कप्तान विजय हजारे ग्राउंड पर अपने बाकी खिलाड़ियों से हिंदी में बातचीत कर सकें और इंग्लिश क्रिकेटरों के पल्ले कुछ न पड़े। ये क्रिकेटर कोई और नहीं, गोपीनाथ ही थे।
गोपीनाथ के निधन के बाद अब, 95 साल के चंद्रकांत पाटणकर (जो 1956 में ईडन गार्डन्स में न्यूजीलैंड के विरुद्ध एक टेस्ट खेले), अब भारत के सबसे बड़ी उम्र के जीवित टेस्ट क्रिकेटर हैं।
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चरनपाल सिंह सोबती