शतरंज की दुनिया में जिन खिलाड़ियों ने भारत का नाम वैश्विक मंच पर रोशन किया है, उनमें पेंटाला हरिकृष्णा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। हरिकृष्णा को तकनीकी रूप से दक्ष खिलाड़ी माना जाता है।
पेंटाला हरिकृष्णा का जन्म 10 मई, 1986 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर में हुआ था। उन्होंने बचपन में ही शतरंज खेलना शुरू कर दिया था और अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर जल्द ही राष्ट्रीय स्तर और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरे।
हरिकृष्णा ने 2001 में 15 साल की उम्र में ग्रैंडमास्टर का खिताब जीता था। इसके बाद 2004 में विश्व जूनियर शतरंज चैंपियनशिप जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम बनाया था। विश्वनाथन आनंद के बाद यह खिताब जीतने वाले वह दूसरे भारतीय खिलाड़ी बने थे। हरिकृष्णा 2001 में कॉमनवेल्थ चैंपियन और 2011 में एशियन इंडिविजुअल चैंपियन रहे थे। 2012 में टाटा स्टील ग्रुप बी और 2013 में उन्होंने एमटीओ मास्टर्स टूर्नामेंट ओपन इवेंट जीता। हरिकृष्णा ने 2000 से 2012 तक सात चेस ओलंपियाड में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 2010 में वर्ल्ड टीम चेस चैंपियनशिप में टीम कांस्य जीता। एशियन टीम चैंपियनशिप में, हरिकृष्णा ने अपनी टीम के लिए स्वर्ण पदक और दो रजत पदक (2003 और 2012) जीते।
पेंटाला हरिकृष्णा का जन्म 10 मई, 1986 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर में हुआ था। उन्होंने बचपन में ही शतरंज खेलना शुरू कर दिया था और अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर जल्द ही राष्ट्रीय स्तर और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरे।
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मौजूदा समय में भारत के डी. गुकेश और आर. प्रज्ञानंदा जैसे युवा खिलाड़ी वैश्विक मंच पर शतरंज की दुनिया में धूम मचा रहे हैं। इन खिलाड़ियों के लिए पेंटाला हरिकृष्णा का करियर प्रेरणादायी रहा है। 40 साल के होने जा रहे पेंटाला हरिकृष्णा अभी भी शतरंज की दुनिया में सक्रिय हैं और बड़े खिताबों पर अपनी नजर बनाए हुए हैं।