भारत में शतरंज को लोकप्रिय बनाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों में दिब्येंदु बरुआ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्होंने उस दौर में शतरंज में अपनी पहचान बनाई, जब भारत में इस खेल के लिए सुविधाएं और संसाधन सीमित थे।
अपनी मेहनत, लगन और शानदार खेल के दम पर उन्होंने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। साल 1991 में ग्रैंडमास्टर बनने के साथ ही वह विश्वनाथन आनंद के बाद भारत के दूसरे ग्रैंडमास्टर बने। उनकी इस उपलब्धि ने देश के कई युवाओं को शतरंज में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया।
दिब्येंदु बरुआ का जन्म 27 अक्टूबर 1966 को कोलकाता में हुआ था। उन्हें बचपन से ही शतरंज खेलने का शौक था। धीरे-धीरे यह शौक उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गया और उन्होंने इस खेल में आगे बढ़ने का फैसला किया। अमेरिकी शतरंज खिलाड़ी बॉबी फिशर से प्रेरित बरुआ ने कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा दिखानी शुरू कर दी थी। वह खेल को समझने और अपनी चालों से विरोधियों को चुनौती देने में माहिर थे।