भारत में वॉलीबॉल का खेल लोकप्रियता के मामले में अन्य शीर्ष खेलों से काफी पीछे है और अभी भी राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन एक ऐसा भी खिलाड़ी हुआ है जिसने वॉलीबॉल में अपनी पूरी जिंदगी झोंक दी, और उन्हें 'गॉड ऑफ भारतीय वॉलीबॉल' कहा जाता है। हम बात कर रहे हैं जिम्मी जॉर्ज की।

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जिम्मी जॉर्ज का जन्म 8 मार्च 1955 को केरल के कन्नूर जिले के एक छोटे से शहर पेरवूर में हुआ था। उनके पिता, जोसेफ जॉर्ज, एक वकील थे और एक यूनिवर्सिटी स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी रह चुके थे। उनकी माता का नाम मैरी जॉर्ज था। जॉर्ज के घर में खेल का माहौल था। उन्हें वॉलीबॉल खेलने का जुनून अपने पिता से ही मिला। वह पढ़ाई में भी अच्छे थे और सरकारी कॉलेज में मेडिकल सीट भी हासिल की थी, लेकिन वॉलीबॉल के लिए मेडिकल छोड़ दिया था।

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16 साल की उम्र में ही केरल स्टेट टीम में अपनी जगह बना चुके जॉर्ज ने स्कूल-कॉलेज के दिनों में वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में कई पुरस्कार जीते। केरल विश्वविद्यालय को साल 1973 और साल 1976 के बीच लगातार चार ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप खिताब दिलाने में सफल रहे थे। वह साल 1973 में टीम के कप्तान भी थे।

जिमी जॉर्ज साल 1974 में तेहरान में हुए एशियन गेम्स में भारतीय राष्ट्रीय वॉलीबॉल टीम का भी हिस्सा थे। भारत उस संस्करण में ग्रुप स्टेज से आगे नहीं बढ़ सका था, लेकिन 19 साल की उम्र में जिमी जॉर्ज ने अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित कर दिया था।

साल 1976 में जिमी जॉर्ज ने वॉलीबॉल पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करने के लिए मेडिकल कॉलेज छोड़ दिया और केरल पुलिस में शामिल हो गए।

21 वर्ष की उम्र में जिमी जॉर्ज अर्जुन पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे। वह भारत के सर्वोच्च खेल पुरस्कारों में से एक प्राप्त करने वाले सबसे कम उम्र के वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं।

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जिमी ने रूसी कोच सर्गेई इवानोविच गैवरिलोव की सलाह पर वॉलीबॉल को पेशेवर रूप में अपनाया। वह 1979 में अबू धाबी स्पोर्ट्स क्लब से खेलने के लिए विदेश चले गए और इतिहास में पहली बार भारतीय पेशेवर वॉलीबॉल खिलाड़ी बने। अबू धाबी में तीन साल की अवधि के दौरान जिमी जॉर्ज को फारस की खाड़ी क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ वॉलीबॉल खिलाड़ी भी चुना गया।

जिमी जॉर्ज ने 1982 में इटालियन क्लब पल्लावोलो ट्रेविसो के साथ करार किया। इस लीग में उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वॉलीबॉल खिलाड़ियों के साथ खेला। स्टार एथलीटों के साथ खेलते हुए उन्होंने कोर्ट पर अपने खेल से सबको प्रभावित किया। इटली में रहते हुए सात सीजन में अलग-अलग क्लबों से खेलते हुए जॉर्ज ने बड़ा नाम बनाया।

जॉर्ज की लंबाई 6’2” जिसकी वजह से वॉलीबॉल में उन्हें बड़ी सफलता मिली। वह अपनी ऊंची छलांग और गेंद को उछालने और सर्व करने की क्षमता के लिए जाने जाते थे। जिमी जॉर्ज ने साल 1985 में सऊदी अरब में भारत की कप्तानी की। 1986 में हैदराबाद में इंडिया गोल्ड कप इंटरनेशनल वॉलीबॉल टूर्नामेंट खिताब के लिए टीम का नेतृत्व भी किया। उन्होंने सियोल 1986 एशियाई खेल में जापान को हराकर भारतीय टीम को कांस्य पदक जिताने में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय को भारतीय वॉलीबॉल के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है।

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जिमी जॉर्ज ने 1987-88 सीजन के लिए इटली की शीर्ष डिवीजन क्लब यूरोस्टाइल-यूरोसिबा के साथ करार किया। 30 नवंबर 1987 को 32 वर्ष की आयु में जिमी जॉर्ज की इटली में एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई।

जॉर्ज की लंबाई 6’2” जिसकी वजह से वॉलीबॉल में उन्हें बड़ी सफलता मिली। वह अपनी ऊंची छलांग और गेंद को उछालने और सर्व करने की क्षमता के लिए जाने जाते थे। जिमी जॉर्ज ने साल 1985 में सऊदी अरब में भारत की कप्तानी की। 1986 में हैदराबाद में इंडिया गोल्ड कप इंटरनेशनल वॉलीबॉल टूर्नामेंट खिताब के लिए टीम का नेतृत्व भी किया। उन्होंने सियोल 1986 एशियाई खेल में जापान को हराकर भारतीय टीम को कांस्य पदक जिताने में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय को भारतीय वॉलीबॉल के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है।

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जिमी जॉर्ज अगर जिंदा होते तो निश्चित रूप से वॉलीबॉल की स्थिति भारत में मौजूदा समय से बेहतर होती।

Article Source: IANS
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