भारत में लंबी दूरी की दौड़ को अक्सर क्रिकेट और दूसरे लोकप्रिय खेलों जितना महत्व और पहचान नहीं मिल पाती है। हालांकि, सावन बरवाल ने साबित किया कि मेहनत और लगातार अभ्यास से अलग पहचान बनाई जा सकती है। देश के सबसे होनहार मैराथन रनर में से एक बनने का रास्ता भीड़-भाड़ वाले एरीना से दूर, हिमाचल प्रदेश के जोगिंदर नगर की शांत पहाड़ियों से शुरू हुआ, जहां धैर्य सिर्फ ट्रेनिंग कैंप में ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में भी बनता है।
इस साल की शुरुआत में सावन ने भारत का 48 साल पुराना नेशनल मैराथन रिकॉर्ड तोड़कर इतिहास रच दिया। उनकी इस उपलब्धि ने शांत स्वभाव वाले इस आर्मी एथलीट को अचानक राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बावजूद बातचीत में यह रिकॉर्डधारी धावक शोहरत की बजाय अनुशासन, रिकवरी, धैर्य और उन लोगों की ज्यादा बात करता है, जिन्होंने उन मुश्किल वर्षों में चुपचाप उनका साथ दिया, जब सफलता की कोई गारंटी नहीं थी।
सावन ने 'आईएएनएस' के साथ एक खास बातचीत में पहाड़ों में बड़े होने, चोटों से उबरने, परिवार के त्याग और लंबी दूरी की दौड़ के सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक लड़ाई होने पर भी बात की।