Rex Sellers: हाल ही में, भारत में घरेलू क्रिकेट (रणजी ट्रॉफी और आईपीएल भी) खेले दो खिलाड़ियों अक्षदीप नाथ और हरप्रीत सिंह भाटिया  ने यूएई के लिए नेपाल के विरुद्ध टी20 इंटरनेशनल मैच खेले। इसमें कुछ भी अनोखा नहीं हुआ क्योंकि पहले भी और कई खिलाड़ी ऐसा कर चुके हैं। इस बार एक फ़र्क रहा। पहले जब भी एशिया के क्रिकेटर, यूएई के लिए खेलते थे तो उनके पास प्रवासी होने के नाते, पासपोर्ट अपने मूल देश का ही होता था। इस बार इतिहास ये बना कि यूएई ने 5 खिलाड़ियों, खुज़ैमा तनवीर, अजय कुमार, अक्षदीप नाथ, हरप्रीत सिंह भाटिया और अदीब उस्मान को 'नेचरलाइजेशन (naturalization)' के ज़रिए यूएई का सिटीजन बना दिया। अपना पासपोर्ट दिया और फटाफट यूएई की टूरिंग टीम में शामिल कर लिया।

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ऐसे कई खिलाड़ी हैं जिनका जन्म भारत में हुआ, लेकिन वे दूसरे देशों के लिए खेले, बिना किसी क्वालिफिकेशन प्रक्रिया, क्योंकि उनके पास पहले से ही 'अपने' देश का पासपोर्ट था; जैसे, इंग्लैंड के कॉलिन काउड्रे, आर. सुब्बा राव और नासेर हुसैन। ये सब जिक्र हमें एक और ऐसे 'इंग्लिश' क्रिकेटर के किस्से पर ले जाता है जिनका जन्म भारत में हुआ, लेकिन वे टेस्ट खेले ऑस्ट्रेलिया के लिए। ये किस्सा रेक्स सेलर्स (Rex Sellers) नाम के उस क्रिकेटर का है जो न तो ज़्यादा मशहूर हुए और न ही जिनके बारे में ज्यादा जानकारी है। भारत से अपने जुड़ाव के कारण, वे हमेशा एक 'साहिब' के तौर पर ही चर्चा में रहे। 

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* रेजिनाल्ड ह्यू डर्निंग 'रेक्स' सेलर्स (Reginald Hugh Durning ‘Rex' Sellers), एक लेग-स्पिनर थे। जन्म बॉम्बे (अब मुंबई) में हुआ पर बचपन मुंबई से 200 किलोमीटर नार्थ में स्थित एक छोटी-सी एंग्लो-इंडियन रेलवे कॉलोनी, 'बर्सार' में बीता। वहां रहते हुए उन्होंने हिंदी और गुजराती के कुछ शब्द भी सीख लिए थे।

* भारत में ब्रिटिश राज के दौरान, इंग्लैंड से यहां काम के लिए आए कई पुरुषों ने यहीं शादी की और परिवार बनाया लेकिन जब भारत आजाद हुआ, तो इनमें से ज्यादातर यहां से चले गए। रेक्स के पिता, एल्फ़ सेलर्स, भारतीय रेलवे में इंजीनियर थे और अपने प्राइवेट 'सैलून कार' से रेलवे पुलों की मरम्मत का काम देखते थे। 1000 से ज़्यादा का स्टाफ संभालते थे। उन्होंने अपने परिवार (पत्नी आइरीन और बेटों रेक्स व बेसिल) को तो भारत से बाहर भेज दिया पर खुद रुके रहे ताकि अपनी काम की जिम्मेदारी पूरी कर लें।

* हैरानी की बात ये रही कि आइरीन के पास हालांकि ब्रिटिश पासपोर्ट था पर वे ऑस्ट्रेलिया गईं। तब ऑस्ट्रेलिया वाले सांवली स्किन वाले एंग्लो-इंडियन को भी अपने देश में बसने नहीं देते थे लेकिन आइरीन को न रोका। असल में एक स्किन की बीमारी के कारण उनकी स्किन तो अपना रंग खो, सफ़ेद हो गई थी और इस तरह से उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के 'स्किन के रंग वाले अनऑफिशियल टेस्ट' को पास कर लिया। 

* ये परिवार दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में बस गया, और आइरीन, जो भारत में घर में 8 काम करने वालों के साथ 'मेमसाहिब' हुआ करती थीं, अब एक ड्राई क्लीनर के पास दिन में आठ घंटे की ड्यूटी पर कपड़े प्रेस करती थीं।

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* ऐसे ही रेक्स को भी अपने स्कूल में बड़ी मुश्किल हुई। बहरहाल जब स्कूल की क्रिकेट टीम में आ गए तो माहौल दोस्ताना बन गया। यहां से वे एक दिन 'बैगी ग्रीन' (ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट कैप) पहनने का सपना देखने लगे।

* जब लोकल क्लब 'केंसिंग्टन' में खेलते थे तो रेक्स को पूर्व टेस्ट खिलाड़ी गैफ़ नोबल ने कोचिंग दी। 19 साल की उम्र में अपना पहला 'फर्स्ट-क्लास' मैच खेल लिया। 1960-61 में वहां, टूर पर आई वेस्टइंडीज की ग्रेट टीम के विरुद्ध भी खेले। बाद में उनके साथ खेले, इयान रेडपाथ उन्हें स्पिन गेंदबाजी का सच्चा उस्ताद कहते थे और गेंद की स्टाइल में बदलाव उनकी खूबी थी। 

* इस सब के बावजूद, रेक्स को क्रिकेट में कोई ख़ास कामयाबी न मिली और साउथ ऑस्ट्रेलिया की टीम में भी नियमित न खेल पाए। 21 साल की उम्र तक ही मान लिया था कि क्रिकेट करियर लगभग ख़त्म और तब ध्यान क्रिकेट से हटा, फल व सब्ज़ियों के बिजनेस पर लगा दिया। 

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* इसी दौरान, मुलाक़ात हुई एक पुराने कोच, हावर्ड मटन से। उन्होंने रेक्स को मना लिया कि काम पर जाने से पहले, हफ़्ते में दो बार सुबह 6 बजे प्रैक्टिस के लिए आना शुरू कर दें। ये तरीका काम कर गया और 12 महीने बाद, रेक्स फिर से क्रिकेट के लिए तैयार थे।

* वापसी पर, साउथ ऑस्ट्रेलिया के लिए पहला मैच, MCG में 'शील्ड' चैंपियन विक्टोरिया के विरुद्ध खेला और अपनी टीम को जीत दिला दी मैच में 149 रन देकर 8 विकेट लेते हुए। 'ऑस्ट्रेलियन स्पोर्ट एंड सर्फिंग जर्नल' में अगले दिन हैडलाइन थी: 'साहिब की वापसी!'

* इसके बाद अगले 'एशेज' और वहां से वापस लौटते हुए भारत टूर के लिए सलेक्शन हो गया। इस पर ब्रिटिश मीडिया में काफ़ी हंगामा हुआ और आरोप लगा कि रेक्स तो ऑस्ट्रेलिया के लिए, टेस्ट खेलने के लिए क्वालीफाई ही नहीं करते क्योंकि जन्म भारत में हुआ था और उनके पास ब्रिटिश पासपोर्ट था। ये मामला इतना बढ़ा कि क्रिकेट-प्रेमी ऑस्ट्रेलियाई प्राइम मिनिस्टर रॉबर्ट मेन्ज़ीस के ऑफिस तक पहुंच गया। तब उन्होंने खुद इस मामले को निपटाया और रेक्स को ऑस्ट्रेलिया का सिटीजन बनाने की प्रक्रिया तेज़ी से पूरी करवा दी। 

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* संयोग से, इंग्लैंड में सीरीज शुरू होने से पहले ही रेक्स फिट नहीं थे। उनकी स्पिन करने वाली उंगली से जुड़ी एक नस (tendon) के नीचे एक बड़ी 'सिस्ट' (गांठ) का पता चला जिसके इलाज के कारण 6 हफ्तों के बाद ही टूर पर अपना पहला मैच खेला। बचे टूर पर 13 मैचों में 37 के औसत से 30 विकेट लिए। अब वे भारत में खेलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।

* भारत पहुंचने पर उनका जोरदार स्वागत हुआ। वे जहां भी जाते, सैकड़ों प्रशंसक उनका अभिवादन करने भीड़ के तौर पर इकट्ठा हो जाते। वह तब तक, गुजराती या हिंदी भूल चुके थे, तब भी वे ही टीम और बस ड्राइवर और उन 'छोकरों' के बीच की कड़ी थे, जो किट उठाते थे और उसे चोरी से बचाने के लिए उसके ऊपर ही सो जाते थे।

*सीरीज का तीसरा और निर्णायक टेस्ट ईडन गार्डन्स में खेले 17 अक्टूबर, 1964 से और रेक्स सेलर्स ऑस्ट्रेलिया के 230 वें टेस्ट क्रिकेटर बन गए और भारतीय मूल के ऐसे पहले खिलाड़ी (ढाका में जन्मे ब्रैनसन कूपर वैसे पहले ऐसे ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट क्रिकेटर थे पर बाद में ढाका भारत का हिस्सा न रहा और इस वजह से रेक्स को ही पहला गिनते हैं)।

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रेक्स सेलर्स पहली पारी में 167-8 के स्कोर पर बल्लेबाजी करने उतरे, तो भारतीय दर्शकों ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया लेकिन कोई खास धूम-धड़ाका नहीं हुआ। पहली पारी में 5 ओवर गेंदबाजी की जिसमें प्रदर्शन 0-18 था। इसके बाद अचानक ही जोरदार बारिश शुरू हो गई और ये टेस्ट मैच आगे न खेल पाए और सीरीज़ ड्रॉ रही। 

* रेक्स जब तक ऑस्ट्रेलिया लौटे, एक और सिस्ट बन गई थी जो पहली से भी बड़ी थी। इस वजह से गेंद को ठीक से पकड़ने या लंबे समय तक गेंदबाजी में दिक्कत होने लगी। तब उन्होंने कप्तान फ़ेवेल और सेलेक्टर्स को खबर कर दी कि अब आगे नहीं खेल पाएंगे। और इसी के साथ उनका एक टेस्ट मैच वाला करियर खत्म हो गया।

* वह 1979 से 1983 तक साउथ ऑस्ट्रेलिया के सेलेक्टर रहे। साउथ ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट एसोसिएशन के लाइफ मेंबर का सम्मान मिला, 13 साल तक एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट रहे और क्रिकेट में योगदान के लिए उन्हें 2013 में 'ऑर्डर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया मेडल' मिला। 

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रेक्स सेलर्स को हमेशा अफ़सोस रहा कि फिट न होने से क्रिकेट करियर समय से पहले ही खत्म हो गया। उनके कप्तान, फ़ेवेल ने उन्हें 'साहिब' का निकनेम दिया था। वह एक भले इंसान और बेहतरीन एडमिनिस्ट्रेटर थे; साथ ही पहले ऐसे भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट क्रिकेटर थे जिन्हें बड़ी तेज़ी से ऑस्ट्रेलियाई पासपोर्ट दिया था।

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चरनपाल सिंह सोबती

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Charanpal Singh Sobti
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