स्पोर्ट्स में कुछ जीत, जो ग्राउंड में हुआ, उस वजह से यादगार बन जाती हैं। कुछ जीत, उनके हीरो के अपने घर लौटने पर, उसके शहर का कभी न भूलने वाला किस्सा बन जाती हैं। ऐसे ही एक हीरो के घर लौटने वाले किस्से को इलाहाबाद कभी नहीं भूलेगा।
मोहम्मद कैफ के लिए उनके क्रिकेट करियर का सबसे बड़ा पल 13 जुलाई, 2002 को लॉर्ड्स में आया था। लेकिन जो वहां से हजारों किलोमीटर दूर इलाहाबाद में हुआ, वह तो आज भी उनकी आंखों के सामने है, भले ही कुछ महीने बाद इस किस्से के 25 साल पूरे हो जाएंगे।
भारत ने तब नेटवेस्ट ट्रॉफी फाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध जीत के लिए 326 रन का लक्ष्य हासिल किया और दो विकेट से जीते। वैसे जब एक समय स्कोर 146-5 था तो किसने सोचा था कि वे जीतेंगे? इस गजब की वापसी के हीरो थे 21 साल के कैफ जो 87 रन पर आउट नहीं हुए और युवराज सिंह के साथ मैच जिताने वाली 121 रन की पार्टनरशिप की।
लॉर्ड्स ने कैफ को नेशनल हीरो बना दिया पर इलाहाबाद ने उन्हें जो बनाया उसके बारे में तो उन्होंने कभी सोच भी न था। कैफ ने बाद में याद करते हुए कहा, 'मैं तो बड़ा शर्मीला था लेकिन उस दिन मुझे लगा, में तो अमिताभ बच्चन हूं।'
कैफ ने ये तुलना यूं ही नहीं की थी। कैफ इलाहाबाद के तो अमिताभ बच्चन भी तो इलाहाबाद के हैं। शहर में बड़े होते हुए, कैफ उस दिन को कभी भूले नहीं जब अमिताभ बच्चन एमपी का चुनाव जीतने के बाद अपने शहर लौटे तो जश्न में, खुली जीप में सड़कों पर जलूस में घूमे थे। सालों बाद, जब कैफ ने भारतीय क्रिकेट के इतिहास की सबसे यादगार पारियों में से एक खेल, भारत को जीत दिलाई तो इलाहाबाद लौटने पर शहर ने भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर उन्हें भी एक खुली जीप में घुमाकर, उनका स्वागत किया था। हजारों लोग जीत का जश्न मनाने घरों से बाहर आ गए थे।
सच तो ये है कि भारत की जीत और कैफ की घर वापसी का किस्सा लॉर्ड्स में फाइनल के बीच ही शुरू हो गया था। जब भारत का स्कोर 146-5 था तो कैफ के अब्बा मोहम्मद तारीफ और बड़े भाई सैफ ने भी जीत की उम्मीद छोड़ दी थी। बड़ी हार सामने दिख रही थी और उन्हें डर था कि कुछ गड़बड़ न हो जाए। नतीजा: घर पर ताला लगाया और चल दिए इलाहाबाद के एक सिनेमा हॉल में शाहरुख खान की फिल्म 'देवदास' देखने। जब वे थिएटर के अंधेरे में बैठे थे, तब कैफ लंदन में अपने क्रिकेट करियर की सबसे बेहतरीन पारी खेल रहे थे।
जब तारीफ और सैफ सिनेमा हॉल से बाहर निकले, तो हैरान रह गए। इलाहाबाद के आकाश पर तो कुछ और ही नजारा था। सड़कों पर आतिशबाजी, जश्न और लोगों का शोर-शराबा था। लोग खुशी से झूम रहे थे। उन्हें कुछ समझ न आया और हैरान-परेशान जब घर पहुंचे तो देखा कि उनके गेट के बाहर बहुत बड़ी भीड़ जमा थी। एक बार तो उन्हें भी लगा कि कि किसी गलत दरवाजे पर आ गए हैं। तब जो सुना उस पर विश्वास ही नहीं हुआ कि क्या सच में उनके बेटे 'हनी' (कैफ का निकनेम) ने भारत के लिए मैच जीत लिया है? जो हार के बाद, डर में रात के अंधेरे में लौटने के लिए सिनेमा देखने गए थे, उन्हें क्या मालूम था कि उनका बेटा तब तक शहर का का हीरो बन चुका होगा?
लॉर्ड्स में उस मैच में इंग्लैंड ने 325 रन बनाए थे जिसमें कप्तान नासिर हुसैन के 115 रन थे। जवाब में भारत ने शुरुआत तो अच्छी की पर 106-0 से ऐसे लड़खड़ाए कि स्कोर 146-5 हो गया। यहां से युवराज और कैफ के बीच 121 रन की पार्टनरशिप हुई और मैच का रुख बदल दिया। युवराज के आउट होने के बाद भी कैफ आखिर तक डटे रहे। भारत को 7 गेंद में 6 और फिर आखिरी ओवर में दो रन की जरूरत थी। आखिरकार कैफ और जहीर खान ने जीत के लिए जरूरी रन बना दिए। ये भारतीय वनडे इतिहास के सबसे रोमांचक फिनिश में से एक था। कैफ 75 गेंद पर 87 रन बनाकर आखिर तक आउट नहीं हुए और 'प्लेयर ऑफ द मैच' थे।
लॉर्ड्स में तो जश्न शानदार था ही लेकिन इलाहाबाद में कैफ का जो स्वागत हुआ, वह बिल्कुल अलग था। घर लौटे, तो उनके इलाके की सड़कें खचाखच भरी हुई थीं। लोग अपने लोकल हीरो को देखने बाहर निकल आए थे। भीड़ इतनी थी कि खुली जीप में निकाला जुलूस, 5-6 किलोमीटर की दूरी को लगभग तीन-चार घंटे में पूरा कर सका। सड़कों पर लोगों की लाइन लगी थीं, फूलों के हार डाल रहे थे, मिठाइयां बांट रहे थे और सब जोश में थे। इलाहाबाद में उनके जश्न मनाने के तरीके में कुछ ऐसा था जो किसी कविता जैसा खूबसूरत था।
बचपन में कैफ ने अमिताभ बच्चन को खुली जीप में जुलूस के दौरान एक बहुत बड़े स्टार की तरह सम्मानित होते देखा था। अब, खुद भी कुछ वैसा ही अनुभव कर रहे थे। इसलिए उनकी स्टेटमेंट, 'मुझे अमिताभ बच्चन जैसा महसूस हुआ' खुद में यादगार बन गई। ये सिर्फ जश्न नहीं था, इलाहाबाद के उस लड़के के सफर की स्टोरी था जिसने दूर से एक हीरो को सम्मानित होते और अचानक खुद को भी वैसे ही सम्मानित होते देखा।
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इलाहाबाद के लिए ये बहुत बड़ा दिन था। इस शहर ने कई खिलाड़ी दिए लेकिन कैफ यहां के सबसे बड़े क्रिकेट हीरो बन गए। 2006 में उत्तर प्रदेश टीम के कप्तान के तौर पर बंगाल को एक यादगार फाइनल में हराकर, टीम को उसका पहला रणजी ट्रॉफी टाइटल जिताया और कुल 13 टेस्ट, 125 वनडे और 177 फर्स्ट -क्लास मैच खेले।