पूर्व भारतीय बैडमिंटन स्टार ज्वाला गुट्टा का मानना ​​है कि अगर उन्हें अपने खेलने के दिनों में लगातार संस्थागत समर्थन मिला होता और विवादों से दूर रखा गया होता, तो उनका करियर और भी ऊंचाइयों तक पहुंच सकता था। 'आईएएनएस' के साथ एक खास इंटरव्यू में, इस पूर्व डबल्स खिलाड़ी ने बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बाई) के पूर्व अध्यक्ष वीके वर्मा और कोचों पर गंभीर आरोप लगाए, और दावा किया कि उनके करियर को किनारे करने की बार-बार कोशिशें की गईं।

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2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की गोल्ड मेडलिस्ट ने उच्चतम स्तर पर मुकाबला करने की कोशिश करते हुए, बार-बार सिस्टम से लड़ने के भावनात्मक और पेशेवर बोझ के बारे में खुलकर बात की।

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गुट्टा ने आरोप लगाया, "वीके वर्मा ने मेरा करियर खत्म करने की पूरी कोशिश की।" कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 को याद करते हुए, जहां उन्होंने और अश्विनी पोनप्पा ने गोल्ड जीता था, जिसके बाद उसी शाम साइना नेहवाल ने अपना सिंगल्स खिताब जीता था, गुट्टा ने कहा कि उन्हें जश्न में साफ तौर पर भेदभाव महसूस हुआ।

उन्होंने कहा, "अश्विनी और मैं गोल्ड जीतने वाली पहली खिलाड़ी थीं, क्योंकि हमने साइना से दो घंटे पहले खेला था। तकनीकी रूप से, हम गोल्ड जीतने वाली पहली महिलाएं थीं।"

गुट्टा ने बताया कि उन्होंने उस समय सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा जाहिर की थी। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया है कि तत्कालीन बाई अध्यक्ष वर्मा ने साइना की जीत का सार्वजनिक रूप से जश्न मनाया, जबकि डबल्स की जीत के प्रति उन्होंने बहुत कम उत्साह दिखाया।

गुट्टा ने कहा, "दो घंटे बाद, जब साइना जीतीं, तो वीके वर्मा कोर्ट पर दौड़कर आए और उनकी गोल्ड जीत का जश्न मनाया। हमारा गोल्ड कम क्यों था? उस दिन मैंने इंटरव्यू में कहा था, 'वीके वर्मा इस बात से खुश नहीं हैं कि मैं जीती'।"

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गुट्टा ने यह भी आरोप लगाया कि वर्मा ने बिना किसी स्पष्टीकरण के उन्हें भारतीय टीम से बाहर करवा दिया, बावजूद इसके कि वह भारतीय बैडमिंटन में योगदान देने में पूरी तरह सक्षम थीं और फिर रियो ओलंपिक्स के बाद उन्हें फिर से किनारे कर दिया गया; इन सब बातों ने आखिरकार उन्हें सिस्टम से लड़ने का विचार छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

गुट्टा ने कहा, "उन्होंने 2006 में मुझे टीम से बाहर निकाल दिया। कोई कारण नहीं बताया गया। यह सब रिकॉर्ड पर है। रियो ओलंपिक्स के बाद उन्होंने मुझे फिर से बाहर निकाल दिया। उसके बाद मैंने सोचा, लड़ने का क्या फायदा? कोई फायदा नहीं है।"

इसके बावजूद, गुट्टा तर्क दिया कि वह अभी भी युवा डबल्स खिलाड़ियों को ट्रेनिंग और स्पैरिंग के जरिए आगे बढ़ने में मदद करके अपना योगदान दे सकती थीं। गुट्टा ने कहा, "मैंने तो यह भी कहा था कि अगर मैं वहां रहूंगी, तो जूनियर खिलाड़ी मेरे साथ खेलेंगे, जिससे उन्हें स्पैरिंग (अभ्यास) में फायदा होगा। आप मुझे बाहर क्यों निकाल रहे हैं?"

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गुट्टा ने कहा कि कोई भी खिलाड़ी जान-बूझकर झगड़ा नहीं चाहता, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अपना करियर बचाने के लिए मजबूरन लड़ाइयां लड़नी पड़ीं। उन्होंने कहा, "कौन-सा खिलाड़ी विवादों में पड़ना चाहता है? मुझे अपने हक के लिए लड़ना पड़ा। अगर मैं ऐसा नहीं करती, तो मेरा करियर बहुत पहले ही खत्म हो गया होता। सिस्टम को बदलना होगा। हमें खेल को एक ऐसा पेशा बनाना होगा जिसे हर कोई अपना सके, क्योंकि माता-पिता के नैतिक या आर्थिक सहयोग के बिना कोई भी खिलाड़ी नहीं बन सकता।"

ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा का उदाहरण देते हुए, उन्होंने विश्व चैंपियन बनाने में लगातार निवेश और व्यक्तिगत सहयोग के महत्व पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, "नीरज चोपड़ा पर कितना पैसा खर्च किया गया है? हमें सबसे पहले इस बारे में बात करनी चाहिए। विश्व चैंपियन बनने के लिए, एक खिलाड़ी को कितना व्यक्तिगत ध्यान मिलना चाहिए? नीरज चोपड़ा इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं।"

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ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा का उदाहरण देते हुए, उन्होंने विश्व चैंपियन बनाने में लगातार निवेश और व्यक्तिगत सहयोग के महत्व पर जोर दिया।

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इतनी निराशाओं के बावजूद, गुट्टा ने कहा कि वह अभी भी भारतीय खेलों और जमीनी स्तर पर विकास में सार्थक योगदान देना चाहती हैं, लेकिन उन्होंने यह भी माना कि आज के खेल जगत में, अक्सर राजनीतिक प्रभाव ही यह तय करता है कि किसकी बात सुनी जाएगी। उन्होंने कहा, "इसीलिए राजनेता बनना जरूरी है। अब अपनी बात साफ-साफ कहने का सबसे आसान तरीका राजनीति ही है, तब कोई भी आपको बागी नहीं कहेगा।"

Article Source: IANS

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