1 अप्रैल 1999 को पाकिस्तान के खिलाफ खेलकर अपने वनडे करियर की शुरुआत करने वाले वीरेंद्र सहवाग ने पहले मैच में केवल 2 गेंद खेलकर शोएब अख्तर का शिकार बन गए थे। उस वक्त किसी को यकिन ना था कि यह बल्लेबाज आगे चलकर भारतीय क्रिकेट की बल्लेबाजी की गाथा अपने ढंग से लिखने वाला है।

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1996 वर्ल्ड कप में जब श्रीलंका के सनथ जयसूर्या धमाकेदार बल्लेबाजी कर रहे थे तो उस वक्त के क्रिकेट पंडितों की नजरों में किसी कंकड़ की तरह चूभे थे। किसी भी दिग्गज ने यह स्वीकार नहीं किया था कि जयसूर्या की बल्लेबाजी किसी विशिष्ट बल्लेबाज की तरह है।

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ये वो वक्त था जब क्रिकेट ने विवियन रिचर्ड्सन के बाद किसी बल्लेबाज को अपने बल्लेबाजी से पूरे क्रिकेट जगत को चकित कर दिया था। फिर क्रिकेट के पन्नों पर आगमन हुआ वीरेंद्र सहवाग का।

वनडे में 8273 रन औऱ टेस्ट में 8586 रन सहवाग ने अपने बल्ले से बनाए। सहवाग की बल्लेबाजी में ना तो राहुल द्रविड़ जैसी क्लासिकल बैटिंग स्टाइल की झलक थी औऱ ना ही तेंदुलकर की मनलूभावन स्ट्रोक थे जिससे आप उनके कोई स्ट्रोक को देखकर मोहित हो सके। लेकिन जब कभी भी सहवाग ने मैदान पर आकर बड़े – बड़े गेंदबाजों पर प्रहार किया तो क्रिकेट प्रेमी के दिल में सहवाग के लिए प्यार उमड़- उमड़कर तालियों की गड़गडाहट में बदल गया।

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भारतीय क्रिकेट में यह पहली बार हुआ था जब कोई बल्लेबाज किसी भी परिस्थिती में बिना किसी हिचक से बड़े स्ट्रोक लगा रहा था। शायद यही कारण रहा कि भारत के लिए कई मौके पर धमाकेदार बल्लेबाजी कर जीत दिलाने वाले सहवाग को किभी भी क्रिकेट के जानकार ने उम्दा बल्लेबाज के श्रेणी में नहीं रखा। लेकिन सहवाग ने इसकी प्रवाह किए बिना अपने ढंग से रन बनाते रहे औऱ कई ऐन मौके पर अपने विकेट को फेंकते भी रहे।

अपने शुरुआती दिनों में जब सहवाग कलाई के सहारे मिड विकेट औऱ फाइन लेग पर स्ट्रोक खेला करते थे तो सचिन की हल्की झलक साफ तौर पर दिखाई देती थी। यही कारण था कि उनको लोग नजफगढ़ का तेंदुलकर भी बुलाने लगे। सहवाग के पास ये दो स्ट्रोक ही ऐसे थे जो किताबी थे इसके अलावा वो बिल्कुल देसी- ठेठ अंदाज में बल्लेबाजी करते रहे। पूरे करियर में सहवाग की बल्लेबाजी की काबिलियत की पहचान उनका यही स्टाइल बना रहा।

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किसी भी क्षेत्र में यदि आप कुछ अलग करते हैं तो आपको समझाने वाले काफी तदाद में आपके पीछे लगे रहते हैं सहवाग के साथ भी ऐसा ही हुआ। हर बार मैदान पर असफल होने के बाद क्रिकेट पंडित सहवाग को कोसते रहे कि उनको समय के साथ अपनी बल्लेबाजी को ढ़ालना चाहिए पर यह नजफगढ़ का तेंदुलकर अपने मग्न में खोया रहता। सहवाग का यही बेपरवाह अंदाज उनको वर्ल्ड क्रिकेट के दूसरे बल्लेबाजों से अलग करता है।

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वीरू को अपने बल्लेबाजी स्टाइल पर यकिन था उसका ही कारण था कि शतक, दोहरा शतक औऱ तीहरा शतक छक्के के साथ पूरा करते थे औऱ जब नर्वस 90’s में बल्लेबाजी करते थे तो उनके चहरे पर किसी प्रकार की सिकन तक नहीं रेंगती थी। जब कभी भी सहवाग ऐसा करते थे तो टीवी के सेट से सटे क्रिकेट प्रेमियों को यकिन नहीं होता था कि जिस बल्लेबाज पर हम विश्वास नहीं करते वो अचानक से एक से एक रिकॉर्ड वर्ल्ड क्रिकेट में बना जाएगा जिसकी कल्पना नहीं थी, लेकिन सहवाग ने ऐसा किया।

सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग जब भारतीय टीम के लिए ओपनिंग की शुरुआत करते थे तो क्रिकेट प्रेमियों के लिए कभी ना भूलने वाला समय होता था जो पवन की वेग से उड़ने वाले घोड़े की तरह क्रिकेट के इतिहास में स्वर्णिम इतिहास बन गया।

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सहवाग ने सचिन के साथ अपनी जोड़ी को यादगार उस वक्त बनाया जब बाबू मोशाय यानि गांगुली के साथ सचिन की जोड़ी वर्ल्ड क्रिकेट में सबसे बेहतरीन ओपनिंग जोड़ी मानी जाती थी।

इसका श्रेय सहवाग को दोना चाहिए क्योंकि सिर्फ और सिर्फ अपनी बल्लेबाजी स्टाइल के कारण ही सहवाग ऐसा करने में सफल रहे। सबसे हैरान वाली बात ये है कि खुद गांगुली ने सहवाग को अपनी जगह देकर सचिन के साथ बल्लेबाजी करने के लिए आमंत्रित किया था।

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सहवाग ने गांगुली की इस कुर्बानी को जाया नहीं होने दिया। इसके बाद सहवाग ने कई मौके पर अपनी हैरान करने वाली बल्लेबाजी से दर्शकों को गदगद कर झूमने पर मजबूर कर दिया। टेस्ट क्रिकेट में भी सहवाग ने अपने अंदाज को तनिक भी बदला नहीं। पहले टेस्ट में शतक लगाकर वीरू ने अपनी जगह टेस्ट क्रिकेट में बना ली। इसके बाद तो सहवाग ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में जो किया वो असाधारण है।

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लक्ष्मण ने 2001 में कोलकाता के ईडन गार्डन में 281 रन बनाए जो भारत के तरफ से टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक रन था। उस पारी में लक्ष्मण ने अपनी बल्लेबाजी की जो जादूगरी पेश करी थी वो बेमिसाल थी। हर कोई लक्ष्मण की क्लाई से निकले स्ट्रोक को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया था। फिर मार्च 2004 में जब सहवाग ने पाकिस्तान की धरती मुल्तान पर तीहरा शतक जड़ा तो क्रिकेट के दिग्गजों ने इसे भारत की उपलब्धि करार दिया लेकिन किसी ने भी यह नहीं कहा कि वाह – क्या दिल को छूने वाली पारी है।

क्या कारण था कि सहवाग की इस पारी को लोग बस एक रिकॉर्ड भर समझते हैं। इसका एक ही कारण था इस असाधरण पारी में सहवाग ने किताबी स्ट्रोक नहीं खुद के स्ट्रोक मारे थे जो किसी कमर्शियल फिल्म की तरह थी.

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वीरेंद्र सहवाग का करियर पूरी तरह से कमर्शियल फिल्म की तरह रहा है, बस एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट औऱ एंटरटेनमेंट। वीरेंद्र सहवाग ने सभी का दिल जीता है इसमें कोई शक नहीं है। भारतीय क्रिकेट को एक नए अध्याय से जोड़ा है। वैसे, भी हर कोई किसी का फैन नहीं हो सकता है। मैं खुद भी सहवाग का फैन नहीं रहा हूं लेकिन जब कभी भी सहवाग विपक्षी गेंदबाजों पर हावी होते थे तो मंद – मंद मुस्कुराता जरूर था। शायद, सहवाग ने यही जीता है अपने करियर में।

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बस समाप्त हो गया एक ऐसा अध्याय क्रिकेट का जिसमें सिर्फ एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट औऱ एंटरटेनमेंट था।।....

लेखक के बारे में

Saurabh Sharma
Saurabh Sharma is the Editorial Head of Cricketnmore Hindi and a passionate cricket journalist with over 14 years of experience in sports media. He began his journalism career with Navbharat Times, part of the Times of India Group, before moving to television media with Sadhna News. In 2014, he joined Cricketnmore and currently serves as the editor of the platform.
Known for his deep understanding of cricket statistics and unique storytelling approach, Saurabh specializes in cricket news, match analysis, records, and feature stories. Along with editorial responsibilities, he also works as a show producer for popular cricket video series such as Cricket Tales, Cricket Flashback, and Cricket Trivia. Read More
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