सौरव गांगुली देश के सबसे सफल क्रिकेट कप्तानों में शुमार है। 'दादा' के नाम से मशहूर गांगुली ने भारतीय टीम में आक्रामक सोच और युवा खिलाड़ियों को अवसर देने की परंपरा को मजबूत किया। बाएं हाथ के शानदार बल्लेबाज गांगुली ने भारत को विदेशों में कई ऐतिहासिक जीत दिलाईं। संन्यास के बाद दादा ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का अध्यक्ष पद भी संभाला।

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8 जुलाई 1971 को कोलकाता के समृद्ध परिवार में जन्मे सौरव के पिता चंडीदास गांगुली एक शानदार क्लब क्रिकेटर थे, उनके भाई भी इस खेल के शौकीन थे। ऐसे में घर पर हमेशा क्रिकेट की बातें होती रहतीं।

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परिवार के अधिकतर सदस्य बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे। ऐसे में सौरव को भी उल्टे हाथ से बल्लेबाजी करने की आदत पड़ गई। उनके बड़े भाई स्नेहाशीष बंगाल की तरफ से क्रिकेट खेलते थे, लेकिन सौरव ने क्रिकेट के बजाय फुटबॉल को तरजीह दी।

13 साल की उम्र में सौरव गांगुली को समर क्रिकेट कैंप में भेजा गया, जहां इस खेल को लेकर उनकी रुचि जगी। बंगाल और ओडिशा के बीच एक फ्रेंडली अंडर-15 मैच में बंगाल की टीम में एक खिलाड़ी की कमी थी। सौरव को मौका दिया गया और उन्होंने सेंचुरी लगा दी। ये शतक उनके करियर में टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। परिवार ने घर के पास 2 कंक्रीट की पिचें बनवाईं, जिसमें सौरव के साथ स्नेहाशीष प्रैक्टिस करते थे। दोनों के लिए एक कोच भी रखा गया। साथ ही घर में जिम की व्यवस्था भी की गई।

सौरव गांगुली ने साल 1989 में रणजी डेब्यू किया। घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के बाद आखिरकार गांगुली को साल 1992 में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे मैच में डेब्यू का मौका मिल गया, जिसमें उनके बल्ले से सिर्फ 3 रन निकले। इसके बाद गांगुली को टीम से ड्रॉप कर दिया गया।

करीब चार साल बाद साल 1996 में उन्हें टेस्ट में भी पदार्पण का मौका मिला, जिसमें इंग्लैंड के खिलाफ पहली ही पारी में 20 चौकों के साथ 131 रन बनाकर अपनी काबिलियत साबित कर दी। अपने दूसरे टेस्ट में गांगुली ने 136 और 48 रन की पारी खेली। इसके बाद 'प्रिंस ऑफ कोलकाता' ने धीरे-धीरे भारतीय टीम में अपना स्थान मजबूत कर लिया। सौरव 'ऑफ-साइड' में इतना शानदार स्ट्रोक लगाते थे कि उन्हें 'गॉड ऑफ ऑफ-साइड' कहा जाने लगा।

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गांगुली एक भरोसेमंद जोड़ीदार भी थे। 26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ वनडे वर्ल्ड कप मैच में गांगुली ने राहुल द्रविड़ के साथ दूसरे विकेट के लिए 318 रन की साझेदारी की। तेंदुलकर के साथ उन्होंने 176 पारियों में 47.55 की औसत से कुल 8,227 रन बनाए। 26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ 158 गेंदों में 7 छक्कों और 17 चौकों के साथ 183 रन की पारी खेली।

करीब चार साल बाद साल 1996 में उन्हें टेस्ट में भी पदार्पण का मौका मिला, जिसमें इंग्लैंड के खिलाफ पहली ही पारी में 20 चौकों के साथ 131 रन बनाकर अपनी काबिलियत साबित कर दी। अपने दूसरे टेस्ट में गांगुली ने 136 और 48 रन की पारी खेली। इसके बाद 'प्रिंस ऑफ कोलकाता' ने धीरे-धीरे भारतीय टीम में अपना स्थान मजबूत कर लिया। सौरव 'ऑफ-साइड' में इतना शानदार स्ट्रोक लगाते थे कि उन्हें 'गॉड ऑफ ऑफ-साइड' कहा जाने लगा।

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गांगुली की कप्तानी में भारत 'आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2002' का संयुक्त विजेता रहा, जबकि 'वनडे वर्ल्ड कप 2003' के फाइनल में जगह बनाई। दादा के नेतृत्व में टीम इंडिया ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जाकर इन दिग्गज टीमों को अपना दमखम दिखाया। सौरव गांगुली ने युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह, जहीर खान और महेंद्र सिंह धोनी जैसे युवा खिलाड़ियों को बढ़ावा दिया। भारतीय क्रिकेट में उत्कृष्ट योगदान के लिए गांगुली को साल 1997 में 'अर्जुन अवॉर्ड', जबकि साल 2004 में 'पद्म श्री' से नवाजा गया।

Article Source: IANS
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